मथुरा में BJP का ऐसा सियासी किला, जिसे भेदना विपक्ष के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है! लेकिन सवाल ये है कि 2027 में श्रीकांत शर्मा का विजय रथ फिर दौड़ेगा या इस…
मथुरा में BJP का ऐसा सियासी किला, जिसे भेदना विपक्ष के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है! लेकिन सवाल ये है कि 2027 में श्रीकांत शर्मा का विजय रथ फिर दौड़ेगा या इस बार विरोधियों की कोई नई चाल BJP के इस गढ़ में सेंध लगा देगी?2017 में प्रचंड जीत… 2022 में फिर ऐतिहासिक वापसी… और वोटों का ऐसा अंतर कि विरोधियों के सियासी समीकरण ही बिगड़ गए! मथुरा की धरती पर BJP का दबदबा सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि विपक्ष के लिए लगातार खड़ी होती चुनौती है।और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी मथुरा विधानसभा क्षेत्र में भगवा बढ़त! अब सवाल है कि 2027 में मथुरा का सियासी इतिहास बदलेगा या बीजेपी एक बार फिर विपक्ष को बड़े अंतर से पीछे छोड़ देगी?
क्या कांग्रेस अपने पुराने गढ़ में वापसी का दम दिखाएगी, या सपा-बसपा के सामने भी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती रहेगी? क्योंकि मथुरा में लड़ाई सिर्फ एक विधानसभा सीट की नहीं… बल्कि बीजेपी के मजबूत चुनावी समीकरण और विपक्ष की चुनौती की है!भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा… विधानसभा सीट नंबर 84। यहां कभी कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था, लेकिन 1989नवासी के बाद बीजेपी ने अपनी पकड़ मजबूत की। बीच में 2002, 2007 और 2012 में कांग्रेस के प्रदीप माथुर ने जीत दर्ज की, लेकिन 2017 में बीजेपी ने जोरदार वापसी की।
श्रीकांत शर्मा ने 2017 और 2022 में लगातार जीत हासिल कर पार्टी की स्थिति मजबूत की।अब जरा 2022 के नतीजे देखिए! बीजेपी के श्रीकांत शर्मा को मिले 1 लाख 58 हजार 859उनसठ वोट, जबकि कांग्रेस के प्रदीप माथुर को मिले सिर्फ 49 हजार 56 वोट। दोनों के बीच जीत का अंतर रहा करीब 1 लाख 10 हजार वोट!यानी मथुरा में बीजेपी की बढ़त सिर्फ जीत तक सीमित नहीं रही, बल्कि विपक्ष के सामने बड़े अंतर की चुनौती भी खड़ी कर गई।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती!2024 के लोकसभा चुनाव में भी मथुरा विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी पहले स्थान पर रही। पार्टी को 1 लाख 37 हजार 633 वोट मिले, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार को 55 हजार 849 वोट मिले। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग हो सकते हैं, इसलिए इन नतीजों को 2027 का अंतिम संकेत नहीं माना जा सकता। अब सबसे बड़ा सवाल क्या विपक्ष बीजेपी के खिलाफ वोटों को एकजुट कर पाएगा?मथुरा में ब्राह्मण, बनिया, जाट, ठाकुर, दलित और अन्य समुदायों के मतदाता चुनावी समीकरण में अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन सिर्फ जातीय आंकड़ों से जीत तय नहीं होती। उम्मीदवार की छवि, स्थानीय समस्याएं, संगठन और मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी चुनाव का रुख प्रभावित करती हैं।
उधर, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद मतदाताओं की संख्या में बड़ी कमी का दावा भी चर्चा में है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में 4 लाख 72 हजार 650 मतदाताओं के मुकाबले 2026 में संख्या 3 लाख 80 हजार 330 बताई गई है। यानी 92 हजार 320 की कमी। हालांकि इस अंतर के कारणों और अंतिम आधिकारिक मतदाता सूची की पुष्टि जरूरी है।ऐसे में बीजेपी के सामने अपने पुराने समर्थन को बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि कांग्रेस, सपा और बसपा के सामने अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने और चुनावी रणनीति तय करने का सवाल होगा।तो क्या 2027 में मथुरा में बीजेपी की जीत का सिलसिला जारी रहेगा? क्या कांग्रेस अपने पुराने सियासी आधार को फिर मजबूत कर पाएगी? और क्या विपक्षी वोटों का समीकरण इस सीट के मुकाबले को नया मोड़ देगा?मथुरा में पिछले चुनावों के आंकड़े बीजेपी की मजबूत स्थिति दिखाते हैं, लेकिन 2027 का फैसला मतदाता करेंगे। उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों और चुनावी गठबंधनों की तस्वीर साफ होने के बाद ही मुकाबले की दिशा का बेहतर अंदाजा लगेगा।मथुरा में नजरें रहेंगी बीजेपी के मजबूत आधार पर… और विपक्ष की उस रणनीति पर, जो 2027 में इस सियासी मुकाबले को किस दिशा में ले जाती है!






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