खानपुर में न पार्टी का सिक्का चला, न सियासत के पुराने खिलाड़ियों का दबदबा बचा! 2022 में एक निर्दलीय ने ऐसा सियासी खेल किया कि BJP के चैंपियन परिवार का पूरा गणि…

खानपुर में न पार्टी का सिक्का चला, न सियासत के पुराने खिलाड़ियों का दबदबा बचा! 2022 में एक निर्दलीय ने ऐसा सियासी खेल किया कि BJP के चैंपियन परिवार का पूरा गणित बिगड़ गया! अब सवाल है 2027 में उमेश कुमार अपनी कुर्सी बचाकर फिर चौंकाएंगे, या BJP के चैंपियन परिवार की वापसी होगी? और इस बार बसपा-कांग्रेस का दांव किसका खेल बिगाड़ेगा?जी हां, हरिद्वार जिले की खानपुर विधानसभा सीट… उत्तराखंड की वो सियासी जमीन, जहां चुनावी जंग सिर्फ पार्टी के सिंबल पर नहीं, बल्कि स्थानीय पकड़, जातीय समीकरण और उम्मीदवार के दम पर लड़ी जाती है। यहां पुराने दिग्गजों का दबदबा भी चुनौती के सामने टिक नहीं पाया! पहले इतिहास का हिसाब देखिए! 2012 में कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन कांग्रेस के टिकट पर जीते। 2017 में उन्होंने BJP का दामन थामा और फिर जीत दर्ज कर अपनी ताकत दिखाई। लेकिन 2022 में BJP ने उनका टिकट काटकर उनकी पत्नी रानी देवयानी को मैदान में उतारा… और यहीं से कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी!पत्रकार से नेता बने उमेश कुमार निर्दलीय मैदान में उतरे और 38,767 सड़सठ वोट हासिल करके जीत गए। BJP का दांव उलटा पड़ा, पुराने सियासी समीकरण हिल गए और खानपुर में एक नए खिलाड़ी ने अपनी ताकत दिखा दी!

लेकिन अब 2027 में उमेश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपनी जीत को दोहराना! निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन दोबारा जनता का भरोसा हासिल करना दूसरी। क्षेत्र में कामकाज, स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता और मतदाताओं की नाराजगी या संतुष्टि ही उनकी अगली परीक्षा तय करेगी। दूसरी तरफ BJP के सामने खोई हुई सीट वापस हासिल करने की चुनौती है। चैंपियन परिवार की स्थानीय पकड़ और पार्टी के संगठनात्मक आधार के दम पर BJP फिर मजबूत दावेदारी पेश कर सकती है। लेकिन सवाल यही है क्या इस बार पार्टी का चेहरा और रणनीति उमेश कुमार को रोक पाएगी?और खानपुर का सबसे बड़ा सियासी ट्विस्ट है वोटों का गणित! यहां मुस्लिम और दलित मतदाताओं की अहम भूमिका के साथ गुर्जर, जाट, राजपूत और दूसरे समुदायों का रुख भी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है। बसपा का मजबूत आधार और कांग्रेस की वापसी की कोशिश इस लड़ाई को बहुकोणीय बना सकती है।मुफ्ती रियासत अली के 2027 में चुनाव न लड़ने के एलान के बाद मुस्लिम मतों का रुख किस ओर होगा, यह भी चर्चा का विषय है। लेकिन यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि पूरा वोट बैंक किसी एक उम्मीदवार के साथ चला जाएगा। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और चुनावी रणनीति ही असली तस्वीर साफ करेंगे।

अब सबसे बड़ा सवाल क्या उमेश कुमार फिर BJP के सियासी दिग्गजों को मात देंगे? क्या चैंपियन परिवार खानपुर में अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल करेगा? या कांग्रेस-बसपा के उम्मीदवार मुकाबले को ऐसा उलझाएंगे कि जीत का गणित आखिरी वक्त तक बदलता रहेगा? खानपुर में 2027 की लड़ाई सिर्फ विधायक चुनने की नहीं… पुराने दबदबे बनाम नए सियासी दम की परीक्षा होगी!** यहां कौन जीतेगा, यह अभी तय नहीं है, लेकिन इतना साफ है जिसने टिकट, जातीय समीकरण और स्थानीय नाराजगी का सही हिसाब लगा लिया, वही खानपुर की सियासत में बाजी मार सकता है!