Uncovered With Manoj Gairola: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब सिर्फ चार-पांच महीने का समय बचा है. सभी राजनीतिक दलों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं. ऐसे में सत्…
Uncovered With Manoj Gairola: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब सिर्फ चार-पांच महीने का समय बचा है. सभी राजनीतिक दलों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं. ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्षी दल भी अपने-अपने सहयोगियों के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चा करने लगे हैं. ऐसे में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच तनातनी शुरू हो गई है. क्योंकि यूपी में दोनों के बीच गठबंधन को लेकर कांग्रेस के नेता जिस तरह से बयान दे रहे हैं. उसका जवाब अखिलेश यादव ने रायबरेली से अपनी पीडीए रथ यात्रा शुरू करके दिया
दरअसल, अखिलेश यादव कांग्रेस को यह मैसेज देना चाहते हैं कि यूपी में योगी के खिलाफ सबसे बड़े नेता वही है. वहीं कांग्रेस का कहना है कि पीडीए यात्रा योगी के खिलाफ कम और कांग्रेस के खिलाफ ज्यादा है. वैसे पिछले कुछ दिनों से सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी की इकरा हसन के बीच भी जुबानी जंग चल रही है. दोनों ही पश्चिम यूपी में मुसलमानों के बड़े चेहरे हैं
दरअसल कांग्रेस और सपा दोनों ही मुस्लिम बहुल इलाकों में ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती हैं क्योंकि यह योगी के खिलाफ सेफ सीटें हैं और यह दोनों के बीच सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. बता दें कि यूपी में मुस्लिम वोट बैंक को समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक माना जाता है, लेकिन अब इस पर कांग्रेस ने भी दावा करना शुरू कर दिया है. यूपी में समाजवादी पार्टी और मुस्लिम वोटर्स का रिश्ता कितना मजबूत है उसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा
दरअसल आजादी के बाद मुसलमान कांग्रेस के ट्रेडिशनल वोटर बन गए. ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित समीकरण के चलते कांग्रेस ने लंबे वक्त तक यूपी में शासन किया. लेकिन जब यूपी में राम मंदिर आंदोलन ने जोर पकड़ा तब परिस्थितियां बदलने लगी. 1990 में मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे. अयोध्या में कार सेवा हो रही थी और बाबरी ढांचे को बचाने के लिए पुलिस ने कार सेवकों पर गोलियां चला दी. इसमें काफी कार सेवक मारे गए. इस घटना के बाद मुलायम सिंह यादव ने खुद को मुसलमानों के रहनुमा के तौर पर पेश किया और मुस्लिम वोटर समाजवादी पार्टी की तरफ आने लगे
यह वही दौर था जब देश में मंडल कमीशन लागू कर दिया गया. ओबीसी जातियां गोलबंद हुई और मुलायम सिंह यादव एक बड़े ओबीसी नेता बन गए. इस तरह मुस्लिम और यादवों का एक ऐसा समीकरण बन गया जो कि सत्ता की चाबी था. 1990 से लेकर अब तक यूपी में एक दो अफवादों को छोड़कर मुसलमान हमेशा समाजवादी पार्टी के साथ रहे. उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोटर्स की कितनी हैसियत है? यह हम इन आंकड़ों से समझ सकते हैं
2011 की जनगणना के अनुसार यूपी में मुसलमानों की संख्या 19.26 फीसदी है. लेकिन कुछ जिलों में इनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि हार जीत का फैसला इन्हीं के वोट से होता है. यह जिले हैं रामपुर में 50.57 प्रतिशत, मुरादाबाद में 50.80 फीसदी, बिजनौर में 43.04%, सहारनपुर में 41.95% मुजफ्फरनगर में 41%, अमरोहा में 40.78% और संभल 40 फीसदी मुस्लिम हैं. इसके अलावा बरेली में 34.54 प्रतिशत और मेरठ में 34.40 फीसदी मुस्लिम हैं. यह तो बात हो गई पश्चिम यूपी की. अगर हम पूर्वांचल को देखें और तराई में मुस्लिम बहुल जिले हैं. इनमें बलरामपुर में 37.51% श्रावस्ती में 30.79% बहराइच 33.53% और सिद्धार्थ नगर में 29.23% मुस्लिम हैं
इसके अलावा कई जिले ऐसे हैं जहां कि अगर मुस्लिम्स की संख्या थोड़ी कम है तो वहां वहां यादव उस कमी को पूरा कर देते हैं. इस तरह मुस्लिम यादव समीकरण एक तगड़ा विनिंग कॉम्बिनेशन बन जाता है. जैसे कि आजमगढ़ जहां मुसलमान 15% के करीब है. लेकिन यादवों की संख्या करीब 25% है. इसलिए आजमगढ़ समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत किला बन गया है. यानी अब आप समझ गए होंगे कि यूपी में मुसलमान कितनी बड़ी चुनावी ताकत है. और यह ताकत कमोबेश अभी तक अखिलेश यादव के ही साथ थी. लेकिन अब कांग्रेस भी मजबूती के साथ मुस्लिम वोटर पर दावेदारी ठोक रही और इसमें सेंध लगाने के लिए हैदराबाद से ओवैसी आ गए हैं
ओवैसी ने यूपी में पिछले दो विधानसभा चुनाव भी लड़े लेकिन मुसलमानों ने उन्हें सीरियसली नहीं लिया. उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली. लेकिन इस बार ओवैसी की रणनीति अलग है. वो मुसलमानों के जेहन में यह बात बिठा देना चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी में मुसलमानों की हैसियत सिर्फ दरी बिछाने की है और सारी मलाईदार पोस्ट यादवों के लिए हैं. अगर इसमें वह थोड़े भी कामयाब हो गए तो मुसलमान समाजवादी पार्टी के अलावा दूसरे विकल्प के बारे में सोच सकते हैं
यह बात अखिलेश भी समझ रहे हैं और कांग्रेस भी. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने 2024 का लोकसभा चुनाव एक साथ लड़ा और उन्हें बंपर जीत भी मिली. कांग्रेस का मानना है कि मुस्लिम और दलित वोट राहुल गांधी की वजह से गठबंधन के हिस्से में आया. जबकि अखिलेश इसे अपने पीडीएफ फार्मूले का नतीजा मानते हैं. अब कांग्रेस अखिलेश को यह जताना चाहती है कि मुसलमान वोटर्स पर समाजवादी पार्टी का एकाधिकार नहीं है
हाल ही में कांग्रेस ने यूपी में ओवैसी की पार्टी के असीम वकार को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया. वो ओवैसी की पार्टी का चेहरा थे. अब कांग्रेस चाहती है कि यूपी चुनाव के लिए जल्द से जल्द गठबंधन का एलान हो और उसे 125 के करीब सीटें मिले और वह ऐसी सीट हो जहां जीतने के चांस ज्यादा हो और इनमें भी मुस्लिम बहुल सीटें ज्यादा हो. शायद अखिलेश यादव पर दबाव बनाने की जिम्मेवारी राहुल ने इमरान मसूद को दे दी
शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब कांग्रेस की तरफ से इमरान मसूद अखिलेश यादव पर अटैक ना करते. अखिलेश ने भी कैराना से समाजवादी पार्टी सांसद इकरा हसन को जवाब देने के लिए मैदान पर उतार दिया. हाल ही में दोनों के बीच जमकर बयानबाजी हुई. और फिर असीम वकार भी इसमें कूद पड़े. अखिलेश यादव ने भी अपने मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करना शुरू कर दिया
एक तरफ तो उन्होंने विधान परिषद में मोहम्मद जासमीर अंसारी को नेता विपक्ष बना दिया ताकि मुसलमानों से दरी बिछवाने का इल्जाम हल्का पड़ जाए. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस को जवाब देने के लिए अपनी पीडीए रथ यात्रा रायबरेली से शुरू की. वो रायबरेली जो यूपीमें कांग्रेस का इकलौता गढ़ है और जहां के सांसद खुद राहुल गांधी हैं






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