बालेन शाह मार्च में प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार विदेश दौरे पर गए थे. अपने पहली ही विदेश यात्रा में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से ऐसी बातें कह…
संयुक्त राष्ट्र महासभा में अक्सर लोगों की निगाहें बड़ी ताक़तों पर रहती है
लेकिन इस बार चर्चा के केंद्र में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह हैं
24 सितंबर को नेपाल के 36 साल के इस युवा पीएम ने यूएन जनरल असेंबली के 81 वें सत्र में अपने भाषण के दौरान जो कहा उसकी काफ़ी प्रशंसा हो रही है
बालेन शाह की इन दो लाइनों की सबसे ज़्यादा प्रशंसा हो रही है- "जिस जलवायु को हमने गर्म नहीं किया, उसकी मार भी हम झेल रहे हैं और उन युद्धों की भी, जिन्हें हमने शुरू नहीं किया."
"हमने युद्ध के लिए बेहतरीन लॉजिस्टिक्स वाला और भोजन के लिए जर्जर लॉजिस्टिक्स वाला संसार बना दिया है."
थिंक टैंक मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट के टर्किश प्रोग्राम की संस्थापक निदेशक गोनुल तोल ने बालेन शाह की इन लाइनों को शेयर करते हुए लिखा है, ''दुनिया की मौजूदा स्थिति को इससे ज़्यादा प्रभावशाली तरीक़े से बयान करना मुश्किल है.''
इस साल मार्च में प्रधानमंत्री बनने बाद अपने पहले विदेश दौरे में न्यूयॉर्क पहुँचे बालेन शाह ने भाषण में दो बड़े युद्धों के बीच फँसी दुनिया में क्लाइमेट चेंज की मार झेल रहे नेपाल की त्रासदी की याद दिलाई
उन्होंने इसे पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी बताया
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कश्मीर पर जो कहा, उस पर भारत ने दिया ये जवाब
'मुझे पता ही नहीं था कि सोते समय मेरा साथी मेरा रेप कर रहा था'
ज्ञानेश कुमार से असहमति जताने वाले चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर संधू को जानिए, कांग्रेस ने नियुक्ति का क्यों किया था विरोध
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग, जानिए मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है
समाप्त
नेपाल में अगस्त महीने में भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में आई बाढ़ से कम से कम 1400 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 6000 लोग अब भी लापता हैं
बालेन शाह ने क्या कहा
देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां
एपिसोड
समाप्त
बालेन शाह ने नेपाल में हाल में आई भीषण बाढ़ से आई तबाही की याद दिलाते हुए कहा, ''इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें समय पर पहुँच जाती हैं. राइफलें और गोला-बारूद हर अड़चन को पार करते हुए तय समय पर पहुँच जाते हैं. लेकिन नेपाल का एक किसान ज़रूरत के वक़्त बाज़ार भाव पर खाद या ईंधन नहीं ख़रीद पाता. हमने ऐसी दुनिया बना दी है, जहाँ युद्ध के लिए लॉजिस्टिक्स बेहतरीन हैं, लेकिन भोजन के लिए लॉजिस्टिक्स पूरी तरह चरमरा गई है."
नेपाल में आई भीषण बाढ़ की त्रासदी का ज़िक्र करते हुए बालेन शाह ने कहा,''काश, आज मैं यहाँ सिर्फ़ विकास, लोकतंत्र, शांति और एक युवा राष्ट्र की उम्मीदों के बारे में बात करने के लिए खड़ा होता. लेकिन इसके बजाय मुझे बड़े पैमाने पर हुई मौत और तबाही के बारे में बात करनी पड़ रही है.''
''उन परिवारों के बारे में, जो अपने उन प्रियजनों के लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं, जो अब कभी घर नहीं आएंगे. उन समुदायों के बारे में, जो कीचड़, चट्टानों और पानी के बीच उन लोगों को तलाश रहे हैं, जिनके शव शायद कभी बरामद नहीं हो पाएंगे.''
''उन पुलों, सड़कों, स्कूलों, घरों और जीवन के बारे में जो बाढ़ के पानी में बह गए.''
उन्होंने कहा, ''भोटेकोशी और त्रिशूली की बाढ़ सिर्फ़ एक स्थानीय त्रासदी नहीं थी बल्कि ये पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी थी. मैं आज आपसे पूछता हूं कि क्या हमने वो चेतावनी सच में सुनी है? तीन साल पहले माउंट एवरेस्ट की छांव में खड़े होकर यूएन सेक्रेट्री जनरल ने मानवता को उस पागलपन को लेकर चेतावनी दी थी, जिसकी वजह से क्लाइमेट डिजास्टर का संकट का खड़ा हो गया है."
''लेकिन दुनिया की छत से पुकारी गई वो आवाज़ दुनिया को ठीक से सुनाई नहीं पड़ी. नेपाल में हमने वो आवाज़ सुनी. हमारे समुदाय ने वो आवाज़ सुनी. वैज्ञानिकों ने वो आवाज़ सुनी और उन्होंने दुनिया को बार-बार सबूतों के साथ इस ख़तरे को सामने रखा.''
''लेकिन हम, दुनिया के राजनीतिक नेताओं ने, इन चेतावनियों को उस गति और बड़े पैमाने पर ठोस कार्रवाई में बदलने में लापरवाही बरती, जिसकी ज़रूरत असुरक्षित और संकटग्रस्त लोगों को है. पिछले महीने हमने इस लापरवाही के दुखद नतीजे देखे. जलवायु परिवर्तन सीमाओं को नहीं मानता. ग्लेशियर और बाढ़ पासपोर्ट पर वीज़ा की मुहर लगवाकर सीमाएं पार नहीं करते.''
उन्होंने कहा, ''मैं यहां शिकायत करने नहीं, बल्कि कुछ सुझाव साझा करने आया हूं. सबसे पहले, मैं इस आपदा के बाद नेपाल की मदद के लिए आगे आने वाले सभी लोगों के प्रति नेपाल का गहरा आभार व्यक्त करना चाहता हूं. हमारे पड़ोसी देशों भारत और चीन ने तुरंत और उदारतापूर्वक मदद की.''
''लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि यह आपदा नेपाल की सीमाओं से कहीं आगे के लिए क्यों मायने रखती है. वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान 0.1 फ़ीसदी से भी कम है. हमने यह संकट पैदा नहीं किया है, फिर भी इसकी बहुत बड़ी क़ीमत हमें चुकानी पड़ रही है.''
''हमारे ग्लेशियर तेज़ी से पीछे हट रहे हैं. हमारी पहाड़ी ढलानें अस्थिर होती जा रही हैं. हमारी नदियों के प्रवाह का अनुमान लगाना मुश्किल होता जा रहा है. और हर बड़ी आपदा वर्षों में हुई विकास की प्रगति को मिटा देने का ख़तरा पैदा करती है. नेपाल के लिए क्लाइमेट डिजास्टर सिर्फ मानवीय संकट नहीं है, बल्कि विकास के लिए भी एक गंभीर इमरजेंसी है.''
बालेन शाह ने कहा, ''क्लाइमेट जस्टिस सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेजों में लिखी एक खूबसूरत बात बनकर नहीं रह सकता. हमारे देश के लोगों को अपना भविष्य बनाने का अवसर मिलना चाहिए, न कि उन्हें बार-बार अपने उजड़े हुए अतीत को फिर से बनाने में ही जुटे रहना पड़े.''
''जब नेपाल का एक गरीब किसान इस मानसून में अपने खेत में बीज बोने गया, तो उसे समय पर खाद नहीं मिली. जब हम नया राजमार्ग बनाना चाहते थे, तो डामर नहीं था. जब एक परिवार शाम को खाना खाने बैठा, तो खाना पकाने के ईंधन की कमी थी.''
उन्होंने कहा, ''एक तरफ पिघलते ग्लेशियर हैं, बर्बाद होती फसलें हैं और बिना किसी चेतावनी के आने वाली बाढ़ है. दूसरी तरफ़ वैश्विक सप्लाई चेन है, जो ऐसी वजहों की क़ीमत गरीब लोगों से वसूलती है, जिनका इस पर कोई नियंत्रण नहीं है.इंटरकॉन्टिनेंटल हथियार और गोलाबारूद सीमाएं पार कर समय पर पहुंच जाती हैं लेकिन नेपाल का एक किसान समय पर बाज़ार भाव पर खाद या ईंधन ख़रीदने से महरूम रहता है.''
''यह सिर्फ़ नेपाल की अपनी तकलीफ़ नहीं है. बांग्लादेश, भूटान. भारत, मालदीव, पाकिस्तान और श्रीलंका से पूछिए. हमारे क्षेत्र के किसी भी दूसरे देश से पूछिए, आपको लगभग यही कहानी सुनने को मिलेगी. हम उस जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं, जो हमारी ओर से धरती को गर्म करने से नहीं हुआ. हम उन युद्धों की भी मार झेल रहे हैं, जिन्हें हमने शुरू नहीं किया.''
नेपाल: पुनर्निर्माण में इतने अरब डॉलर होंगे ख़र्च, भारत समेत किन देशों ने अब तक की मदद8 सितंबर 2026
नेपाल का 'काला गांव' जहां नहीं आई बाढ़ फिर किस लिए परेशान हैं यहां के लोग7 सितंबर 2026
बालेन शाह के 'भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण वाले बयान' पर अब भारत ने दिया ये जवाब2 जून 2026
समाप्त
बालेन शाह के भषण की तारीफ़
बालेन शाह के इस भाषण की ख़ासी चर्चा है. देश और दुनिया दोनों जगह इनके इस भाषण ने लोगों का ध्यान खींचा है
'काठमांडू पोस्ट' ने उनके भाषण की तारीफ़ करते हुए लिखा, ''शाह के भाषण में कूटनीतिक रणनीति भी ध्यान देने लायक थी. पिछले महीने आई बाढ़ के बाद उन्होंने क्लाइमेट जस्टिस की मांग करते हुए दुनिया के सबसे बड़े ग्रीन हाउस उत्सर्जक देशों से मुआवजे की मांग की थी. लेकिन न्यूयॉर्क में शाह ने पहले भारत और चीन का नाम लिया और बाढ़ के बाद उनकी मदद के लिए धन्यवाद दिया.''
काठमांडू पोस्ट ने लिखा, ''सोशल मीडिया पर अपनी सोच-समझकर बनाई छवि के मशहूर शाह ने दुनिया के सबसे बड़े मंच पर अपने शब्दों के बिल्कुल उलट रुख़ अपनाया.''
उन्होंने अपने बारे में की जा रही बात को टालने के लिए कहा, ''मुझे बताया गया कि मैं इस साल महासभा को संबोधित करने वाला सबसे युवा राष्ट्राध्यक्ष हूं. लेकिन मैं हेडलाइन बनाने नहीं आया हूं.''
''लेकिन अपने भाषण के लिए सोशल मीडिया पर सुर्ख़ियां बटोरने वाले शाह की चर्चा एक और वजह से अहम है. नेपाल का पीएम पद संभालने वाले शाह की चुप्पी नेपाल में चर्चा का विषय रही है. लोग कह रहे हैं कि वो एक ऐसे पीएम हैं जो चुपचाप रहकर काम करना पसंद करते हैं.''
नेपाल के जाने-माने पत्रकार कनक मणि दीक्षित ने बालेन शाह की तारीफ़ करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ''
'' प्रधानमंत्री बालेन शाह का भाषण अच्छी तरह तैयार किया गया था. उन्होंने रसुवा आपदा, उसके जलवायु परिवर्तन से जुड़े कारणों और उसके व्यापक प्रभावों को केंद्र में रखा. भारत और चीन से मिलकर काम करने की अपील ऐसी बात थी, जिसे वैश्विक मंच से कहना ज़रूरी था.''
''उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की लंबी सूची गिनाने के बजाय, जैसा कि अक्सर होता है, अपने भाषण को एक स्पष्ट मुद्दे पर केंद्रित रखा. जब नेपाल रिसर्च, डिप्लोमेसी और अपनी उपलब्धियों के दम पर नेतृत्व करने की स्थिति में होगा, तब महासभा के हॉल में उन्हें सुनने के लिए इससे कहीं बड़ी संख्या में लोग मौजूद होंगे.''
''यह दिखाता है कि हमें अभी कितना और काम करने की जरूरत है.''
नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री रमेश नाथ पांडे ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, '' संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने वैश्विक समुदाय का ध्यान पर्यावरण के संकट की ओर कामयाबी से खींचा है. प्रभावशाली और संयमित ढंग से तथ्य पेश करते हुए प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही तबाही को रोकने का एक एजेंडा वैश्विक मंच पर सामने रखा है. नई पीढ़ी के नेतृत्व ने नेपाल को एक बार फिर ऐसा सम्मानित राष्ट्र बनाने की दिशा में सफलता के साथ आगे बढ़ाया है, जिसकी आवाज़ दुनिया भर में सुनी जाए.''
डबलिन यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर रहे महेश कुशवाहा ने बालेन शाह के भाषण की तारीफ़ करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ''आज संयुक्त राष्ट्र महासभा में बालेन का भाषण शानदार था. अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने उनके भाषण में उठाए गए कुछ अहम मुद्दों को जगह दी है और अब इन मुद्दों पर अलग-अलग हलकों में चर्चा होगी, हालांकि न तो यह भाषण और न ही इसकी लोकप्रियता सीधे तौर पर किसी कार्रवाई में बदलेगी, लेकिन किसी देश का रुख़ क्या है, इसे दुनिया तक पहुंचाना महत्वपूर्ण होता है. बालेन ने यह काम बखूबी किया, शायद जितना किसी ने उम्मीद की थी, उससे भी बेहतर.''
''उनके भाषण की कुछ ख़ास ख़ूबियां थीं. नेपाल को मिली वैश्विक मदद के प्रति आभार जताना, टकराव वाली भाषा से बचना, नेपाल जिन बड़े जलवायु संकटों का सामना कर रहा है उनका पैमाना और दुनिया के लिए उनकी प्रासंगिकता साफ तौर पर बताना. भारत और चीन के साथ मिलकर जलवायु नेतृत्व की व्यावहारिक पहल का सुझाव देना और अंत में दक्षिण एशियाई देशों के संदर्भ में दुनिया में बढ़ती अस्थिरता को सामने रखना.''
''एक ख़ास तौर पर समझदारी भरा फैसला यह था कि हाल की त्रासदियों के लिए सीधे "मुआवजा मांगने" या उनकी कीमत तय करने के बजाय, उनसे निपटने के लिए आर्थिक मदद जुटाने की अपील की गई.''
रैपर, मेयर और अब नेपाल के पीएम बनने की राह पर बढ़ रहे बालेन शाह को जानिए7 मार्च 2026
बालेन शाह के ख़िलाफ़ उनकी ही पार्टी के सांसदों में क्यों बढ़ रही है नाराज़गी15 जुलाई 2026
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह का रुख़ भारत के प्रति ऐसा क्यों है? जानिए पूर्व डिप्लौमैट्स से 21 मई 2026
समाप्त
नेपाली पीएम के काले चश्मे की चर्चा
बालेन शाह के भाषण के साथ ही उनका काला चश्मा भी चर्चा के केंद्र में रहा
न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनके काले चश्मे का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया है. उसने लिखा है, ''जब नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया, तो उनकी नाक पर लगा गहरे रंग का चश्मा नेपालियों के लिए पहले से ही जाना-पहचाना था.''
''36 वर्षीय शाह, जिन्हें पूरे देश में सिर्फ 'बालेन' के नाम से जाना जाता है, शायद ही कभी बिना चश्मे के सार्वजनिक रूप से नजर आते हैं. यूएन जनरल असेंबली में भाषण के दौरान शाह ने अपने चश्मे के साथ काला सूट और नेपाल की पारंपरिक टोपी पहने थ. दोनों काले रंग के थे.''
अख़बार लिखता है, ''जुलाई में 'द काठमांडू पोस्ट' के मुताबिक़ शाह कैमरों के सामने और विदेशी राजदूतों के साथ बैठकों में चश्मा लगाए रखते हैं, लेकिन कैबिनेट की बैठकों और निजी बातचीत के दौरान उसे उतार देते हैं. उनके कार्यालय ने इस बारे में पूछे गए सवाल का जवाब नहीं दिया.''
''यह चश्मा उनकी रहस्यमयी छवि को और मजबूत करता है. शाह शायद ही कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं या इंटरव्यू देते हैं. इसके बजाय, वह सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात रखते हैं.''
''अब काला चश्मना उनकी पहचान का एक हिस्सा बन चुका है. नेपाल के सबसे बड़े ऑनलाइन मार्केटप्लेस में से एक डराज़ पर " बालेन शाह ग्लासेस सर्च करने पर उनके चश्मे से मिलते-जुलते कई डिजाइन दिखाई देते हैं.''
''उन्होंने यह चश्मा तब भी पहनना शुरू कर दिया था, जब वह नेपाल के अंडरग्राउंड हिप-हॉप वर्ल्ड में आमने-सामने होने वाली रैप प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने वाले रैपर थे. उस दौरान " नेपाल स्माइलिंग" जैसे उनके गानों ने युवा नेपालियों के बीच उन्हें बड़ी संख्या में प्रशंसक पैदा किए.''
''2022 में शाह ने काठमांडू के मेयर का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीतकर देश के राजनीतिक प्रतिष्ठान को चौंका दिया. तब तक काला सूट और धूप का चश्मा उनकी ऐसी छवि बना चुके थे, जो उन्हें पारंपरिक पार्टी राजनीति से अलग एक बाहरी व्यक्ति के रूप में पेश करती थी.''






टिप्पणियाँ 0