शी ने 2012 के अंत में चीन के शीर्ष नेता बनने के बाद से केवल एक बार संयुक्त राष्ट्र महासभा में व्यक्तिगत रूप से हिस्सा लिया है. शी के शामिल नहीं होने के कई कारण…

वॉशिंगटन डीसी से न्यूयॉर्क अगर आप फ्लाइट से जाते हैं तो मुश्किल से डेढ़ घंटे का वक़्त लगता है

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब 23 सितंबर को वॉशिंगटन पहुँचे तो न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र चल रहा है. लेकिन शी जिनपिंग यहाँ नहीं गए

चीन की तरफ़ से उपराष्ट्रपति हान चेंग 24 से 26 सितंबर तक न्यूयॉर्क में यूएन महासभा में चीन का प्रतिनिधित्व करेंगे

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन के अनुसार, "उपराष्ट्रपति हान चीन की ओर आयोजित ग्लोबल डेवलपमेंट इनिशिएटिव की पांचवीं वर्षगांठ पर होने वाले हाई-लेवल डायलॉग में शामिल होंगे और संयुक्त राष्ट्र महासचिव, 81वें यूएनजीए सत्र के अध्यक्ष के अलावा संबंधित देशों के नेताओं से मुलाक़ात करेंगे."

कहा जा रहा है कि यूएन महासभा में शी की ग़ैर-मौजूदगी चीन की उस लगातार दोहराई जाने वाली बात को कमज़ोर करती दिखती है, जिसमें वह संयुक्त राष्ट्र के महत्व पर ज़ोर देता रहा है

जून 2026 में जारी चीन के वैश्विक शासन पर श्वेत पत्र में भी संयुक्त राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का केंद्र बताया गया है

शी ने 2012 के अंत में चीन के शीर्ष नेता बनने के बाद से केवल एक बार संयुक्त राष्ट्र महासभा में व्यक्तिगत रूप से हिस्सा लिया है. वह 2015 में संयुक्त राष्ट्र की 70वीं वर्षगांठ के मौक़े पर वहाँ गए थे और पहली के साथ अब तक की एकमात्र यूएन महासभा को व्यक्तिगत रूप से संबोधित किया था

गौर करने वाली बात यह है कि यह यात्रा शी की अमेरिका की पिछली राजकीय यात्रा के साथ हुई थी. उस दौरान उन्होंने यूएनजीए में हिस्सा लेने के साथ तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ शिखर बैठक भी की थी. ऐसे में 2026 में उसी तरह की यात्रा नहीं करने का उनका फ़ैसला और भी अहम हो जाता है

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2021 में शी ने यूएनजीए को वीडियो संदेश के ज़रिए संबोधित किया था. इसी दौरान उन्होंने चीन की ग्लोबल डेवलपमेंट इनिशिएटिव की घोषणा की थी. इसके बाद से उन्होंने यूएनजीए को व्यक्तिगत रूप से संबोधित नहीं किया है

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ऑनलाइन मैगज़ीन द डिप्लोमैट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''शी संयुक्त राष्ट्र की 70वीं वर्षगांठ में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने के लिए समय निकालकर गए थे. यह कोई अपवाद नहीं था. 1995 में जियांग जेमिन के समय से चीन के शीर्ष नेता संयुक्त राष्ट्र की हर दसवीं वर्षगांठ में शामिल होते रहे हैं. ऐसे में 2025 में संयुक्त राष्ट्र की 80वीं वर्षगांठ के मौक़े पर शी की ग़ैर-मौजूदगी और भी ज़्यादा उल्लेखनीय थी.''

जापान के मीडिया आउटलेट निक्केई एशिया ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि शी जिनपिंग पहले इसमें शामिल होने वाले थे लेकिन बाद में योजना बदल गई

निक्केई एशिया ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''चीन ने शी के क़रीब 11 साल बाद संयुक्त राष्ट्र में पहला व्यक्तिगत भाषण होने वाली संभावित यात्रा की तैयारी के लिए क़दम भी उठाए थे. चीनी सरकार से जुड़े बातचीत से परिचित एक सूत्र के अनुसार, जुलाई के आख़िर में बीजिंग और वॉशिंगटन ने न्यूयॉर्क में चीन के उप प्रधानमंत्री हे लाइफेंग और अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बीच बैठक कराने की कोशिश की थी. यह बैठक शी की संभावित यात्रा के लिए शुरुआती तैयारी के तौर पर भी काम करती.''

''लेकिन अगस्त के मध्य में न्यूयॉर्क रुकने की योजना रद्द कर दी गई. यह बदलाव आंशिक रूप से यात्रा को तीन दिनों तक सीमित रखने के लिए किया गया था. जब ट्रंप चीन गए थे, तो वह 13 मई की शाम वहाँ पहुँचे और 15 मई को रवाना हुए. चीनी सरकार के सूत्र के अनुसार, बीजिंग ने बाक़ी दुनिया को यह संदेश देने को प्राथमिकता दी कि चीन और अमेरिका बराबरी के स्तर पर हैं.''

निक्केई एशिया ने लिखा है, ''यूएन महासभा में शामिल नहीं होने से जोखिम भी कम हो जाता है. महासभा के दौरान कोई अन्य विश्व नेता अप्रत्याशित रूप से चीन की आलोचना कर सकता है. 2015 में शी की न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर चीन विरोधी प्रदर्शनों ने भी व्यापक ध्यान खींचा था.''

वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के वरिष्ठ सलाहकार स्कॉट कैनेडी ने कहा निक्केई एशिया से कहा, "ऐसा लगता है कि शी ने इस यात्रा के दौरान अमेरिका में उतना ही समय रहने का फ़ैसला किया है, जितना ट्रंप मई में चीन में रहे थे. अटकलें हैं कि यह फ़ैसला आंशिक रूप से इस कठिनाई से जुड़ा था कि ट्रंप के साथ उनकी बैठकों के लिए ज़्यादा व्यापक एजेंडा और अधिक ठोस परिणाम तैयार करना मुश्किल था."

संयुक्त राष्ट्र की कम होती अहमियत

ब्रिटिश न्यूज़ बेवसाइट द इंडिपेंडेंट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि शी जिनपिंग बहुत मज़बूत स्थिति में हैं और इसका असर अमेरिकी दौरे में भी साफ़ दिखा

द इंडिपेंडेंट ने लिखा है, ''विश्लेषकों का कहना है कि ईरान के साथ महंगे युद्ध से परेशान अमेरिकी जनता और मिड टर्म इलेक्शन से पहले अपनी रेटिंग पर पड़ रहे असर के कारण अमेरिकी राष्ट्रपति पर दबाव है, इसलिए शी जिनपिंग अमेरिका के सामने रियायतें देने की कोई जल्दबाज़ी नहीं करेंगे.''

क्राइसिस ग्रुप इंटरनेशनल में अमेरिका-चीन मामलों के वरिष्ठ रिसर्च और एडवोकेसी सलाहकार अली वायने ने द इंडिपेंडेंट से कहा, "ट्रंप ने ईरान को चीन के समर्थन के पैमाने और उसके महत्व को बार-बार कम करके आंका है. न तो उन्होंने और न ही ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया है कि अमेरिका बड़े चीनी वित्तीय संस्थानों को निशाना बनाने की तैयारी कर रहा है या ऐसा करने का उसका इरादा है."

अमेरिका के प्रमुख अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे संयुक्त राष्ट्र की कमज़ोर होती स्थिति से भी जोड़ा है

एनवाईटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''संयुक्त राष्ट्र कमज़ोर, अव्यवस्थित और काफ़ी हद तक अप्रभावी होता जा रहा है, क्योंकि दुनिया की बड़ी शक्तियां लगातार इसे दरकिनार कर रही हैं या इसकी अनदेखी कर रही हैं. यह बात काफ़ी महत्वपूर्ण थी कि शी जिनपिंग ने डोनाल्ड ट्रंप से मिलने के रास्ते में न्यूयॉर्क रुकने की ज़रूरत नहीं समझी. जब सितंबर 2015 में शी ने ओबामा प्रशासन के व्हाइट हाउस का दौरा किया था, तब उन्होंने उसी साल संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी हिस्सा लिया था और भाषण दिया था.''

शी की ग़ैर-मौजूदगी के प्रतीकात्मक महत्व के बारे में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के दौरान रोम स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालयों में अमेरिकी राजदूत रहे जेफ्री प्रेस्कॉट ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, "संयुक्त राष्ट्र के लिए इससे ज़्यादा नुक़सानदेह प्रतीकात्मक संदेश शायद ही हो सकता है. वॉशिंगटन और न्यूयॉर्क के बीच ट्रेन चीन की ट्रेन से धीमी हो सकती है. लेकिन शी यहाँ से बहुत दूर नहीं हैं और फिर भी वह वहाँ जाने के लिए समय नहीं निकाल पाए."

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि इससे आपको पता चलता है कि इस समय संयुक्त राष्ट्र का मंच कितना महत्वपूर्ण रह गया है."

1945 में स्थापित यह वैश्विक संस्था हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मतभेदों के कारण लगभग पंगु हो गई है. सुरक्षा परिषद के पास क़ानूनी रूप से बाध्यकारी प्रस्ताव पारित करने और प्रतिबंध या सैन्य कार्रवाई को मंज़ूरी देने की शक्ति है

अमेरिका, चीन और रूस से जुड़े विवाद, जो सभी सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार रखते हैं, ने ईरान, यूक्रेन, ग़ज़ा, यमन और दक्षिण सूडान जैसे मुद्दों पर ठोस कार्रवाई को बार-बार रोक दिया है