मूल रूप से मिर्जापुर के किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली कविता ने बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2017 में वाराणसी के मिथिलेश कुमार भारती से विवाह किया। शा…
मूल रूप से मिर्जापुर के किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली कविता ने बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2017 में वाराणसी के मिथिलेश कुमार भारती से विवाह किया। शादी के बाद परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए उन्होंने सामाजिक कार्यों से जुड़ने का रास्ता चुना। उनका उद्देश्य गांव की महिलाओं के साथ मिलकर काम करना और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करना था। इसी सोच के साथ कविता राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ीं। स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के बीच काम करते हुए उन्होंने उनकी समस्याओं, जरूरतों और आर्थिक चुनौतियों को करीब से समझा। धीरे-धीरे यह अनुभव उनके लिए सामाजिक बदलाव का माध्यम बन गया।राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत कविता ने स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के साथ पापड़, मुरब्बा, अचार और अगरबत्ती जैसे कुटीर उद्योगों से जुड़ी गतिविधियों में काम किया। इन प्रयासों के जरिए महिलाओं को रोजगार के अवसरों से जोड़ने और उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में काम किया जाता है।
महिलाओं के बीच काम करते हुए कविता ने महसूस किया कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ अपने फैसले खुद लेने का आत्मविश्वास भी उतना ही जरूरी है। सामूहिक प्रयासों से महिलाओं में आगे बढ़ने की क्षमता विकसित होती है और वे परिवार के साथ समाज में भी अपनी भूमिका मजबूत कर सकती हैं।इस दौरान कविता गांव के लोगों को सरकार की विभिन्न योजनाओं की जानकारी देने और पात्र जरूरतमंदों तक उनका लाभ पहुंचाने के प्रयासों में भी जुटी रहीं। लोगों के बीच उनकी सक्रियता और सहयोग की भावना ने उन्हें गांव में एक अलग पहचान दिलाई। यही भरोसा आगे चलकर उनके नेतृत्व की ताकत बना।वर्ष 2021 में ग्राम प्रधान का पद महिला के लिए आरक्षित होने के बाद ग्रामीणों ने कविता को चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया। ग्रामीणों का मानना था कि जो महिला पहले से लोगों की समस्याओं को समझती है और उनकी मदद के लिए आगे आती है, वह गांव की जिम्मेदारी भी बेहतर तरीके से निभा सकती है। कविता के सामने यह एक बड़ा निर्णय था। परिवार की जिम्मेदारियों के साथ पूरे गांव की अपेक्षाओं पर खरा उतरना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इसे चुनौती के बजाय सेवा और विकास के अवसर के रूप में देखा। उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया और ग्रामीणों के समर्थन से ग्राम प्रधान चुनी गईं।
स्वयं सहायता समूह में महिलाओं के साथ काम करने से शुरू हुआ उनका सफर अब गांव की विकास योजनाओं और ग्रामीणों की जरूरतों से जुड़े फैसले लेने तक पहुंच चुका है।मां विंध्यवासिनी धाम के लिए प्रसिद्ध मिर्जापुर की बेटी कविता अब काशी के पतेरवा गांव की बहू के रूप में गांव के विकास की कमान संभाल रही हैं। उनके परिवार की गांव में दुकान है, जबकि उनके पति मिथिलेश कुमार भारती विधि स्नातक हैं और एक इवेंट कंपनी से जुड़े हैं। करीब पांच हजार की आबादी और लगभग 2,700 मतदाताओं वाले पतेरवा गांव में ग्राम प्रधान के सामने विकास से जुड़ी कई जिम्मेदारियां हैं। स्वच्छ पेयजल, सड़क, साफ-सफाई, पंचायत भवन, लाइब्रेरी, परिषदीय विद्यालयों का कायाकल्प, खेल मैदान और पात्र ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना जैसे मुद्दे गांव की प्राथमिकताओं में शामिल हैं।इन जरूरतों को पूरा करने के लिए लगातार संवाद, योजनाबद्ध प्रयास और समय पर निर्णय लेना जरूरी है। कविता के सामने भी यही चुनौती है कि ग्रामीणों की अपेक्षाओं के अनुरूप विकास कार्यों को आगे बढ़ाया जाए और गांव के लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।कविता की कहानी केवल एक महिला के ग्राम प्रधान बनने तक सीमित नहीं है। यह उस आत्मविश्वास की कहानी है, जो सामाजिक कार्यों से अनुभव हासिल करने, लोगों का भरोसा जीतने और बड़ी जिम्मेदारी स्वीकार करने से पैदा होता है। ‘मुझे प्रधान जी नहीं, प्रधान दीदी बोलिए’ का भाव महिलाओं के साथ उनके सहज जुड़ाव और अपनत्व को दर्शाता है। समूह की महिलाओं के बीच काम करने से लेकर पूरे गांव का नेतृत्व करने तक उन्होंने यह साबित किया है कि निर्णय लेने का साहस बदलाव की पहली सीढ़ी है। नवरात्रि विशेष की यह कहानी बताती है कि जब महिलाएं अपनी क्षमता को पहचानकर आगे बढ़ती हैं, तो वे न केवल अपने जीवन की दिशा बदलती हैं, बल्कि समाज और गांव के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कविता का सफर इसी निर्णय शक्ति, आत्मविश्वास और सामाजिक जिम्मेदारी की प्रेरक मिसाल है।






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