लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी करीब एक साल का समय है, लेकिन उससे पहले ही आरक्षण का मुद्दा प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आता दिखाई दे रहा है।…

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी करीब एक साल का समय है, लेकिन उससे पहले ही आरक्षण का मुद्दा प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन और इसके बाद आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों की यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक से मुलाकात ने सियासी बहस को और तेज कर दिया है।

प्रतिनिधिमंडल से बातचीत के दौरान उनकी मांगों को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का भरोसा दिए जाने के बाद विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का मौका मिल गया है। राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह मुलाकात इसलिए अहम है, क्योंकि यूपी में आरक्षण और सामाजिक न्याय का मुद्दा सीधे दलित, पिछड़े और अन्य वंचित वर्गों के वोट बैंक से जुड़ा है।

आरक्षण को लेकर बीजेपी के सामने 2024 का लोकसभा चुनाव एक बड़ा राजनीतिक सबक रहा। उत्तर प्रदेश में बीजेपी 2019 की 62 सीटों से घटकर 2024 में 33 सीटों पर आ गई, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 सीटों के साथ बड़ी बढ़त हासिल की।चुनाव के दौरान संविधान और आरक्षण का मुद्दा विपक्ष के प्रमुख नैरेटिव में शामिल रहा। विपक्ष ने दावा किया कि बीजेपी को बड़ी संख्या में सीटें मिलने पर संविधान और आरक्षण व्यवस्था पर खतरा पैदा हो सकता है। बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया, लेकिन चुनावी नतीजों ने दिखाया कि यह मुद्दा दलित और पिछड़े मतदाताओं के बीच प्रभाव डालने में सफल रहा।CSDS-Lokniti के चुनावी विश्लेषणों में भी बीजेपी को गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच नुकसान की ओर संकेत किया गया था। ऐसे में 2027 से पहले आरक्षण से जुड़ा कोई भी घटनाक्रम बीजेपी के लिए सामान्य राजनीतिक मुद्दा नहीं माना जा सकता।

डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक से आरक्षण सुधार आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों की मुलाकात के बाद समाजवादी पार्टी ने सरकार पर निशाना साधा है। अखिलेश यादव ने आरक्षण सुधार के नाम पर आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने की आशंका जताई और इसे PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक अधिकारों से जोड़ दिया।

वहीं, नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी आरक्षण में किसी तरह के बदलाव का विरोध किया है। उनका कहना है कि आरक्षण सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक वंचना से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का हिस्सा है।

आरक्षण विवाद अगर आगे बढ़ता है तो बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती के लिए भी यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। 2024 में बसपा लोकसभा में एक भी सीट नहीं जीत सकी, लेकिन दलित राजनीति में उसका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

मायावती के सामने चुनौती अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को फिर से मजबूत करने की है। आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर सक्रिय होकर बसपा अपने पुराने राजनीतिक आधार को दोबारा एकजुट करने की कोशिश कर सकती है।

चंद्रशेखर आजाद के लिए आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक विस्तार का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। नगीना से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उनकी राष्ट्रीय पहचान मजबूत हुई है। वह आरक्षण, संविधान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय को लगातार अपने राजनीतिक एजेंडे से जोड़ते रहे हैं।अगर 2027 में आरक्षण बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है, तो पश्चिमी यूपी में चंद्रशेखर आजाद की भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकती है।

बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती सवर्ण वर्ग की मांगों और दलित-पिछड़े वर्गों की आशंकाओं के बीच संतुलन बनाने की होगी। ब्रजेश पाठक जहां पार्टी के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में शामिल हैं, वहीं केशव प्रसाद मौर्य पिछड़े वर्ग के बड़े राजनीतिक चेहरे हैं।2027 से पहले बीजेपी को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि SC, ST और OBC के संवैधानिक आरक्षण अधिकारों से कोई छेड़छाड़ नहीं की जा रही है। दूसरी ओर, सपा, बसपा और चंद्रशेखर आजाद इस मुद्दे को चुनावी जमीन पर कितना बड़ा बना पाते हैं, यह आने वाले महीनों में तय होगा।फिलहाल इतना साफ है कि यूपी में 2027 की सियासी लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की भी होगी। और आरक्षण का मुद्दा इन समीकरणों को प्रभावित करने वाला सबसे अहम मुद्दा बन सकता है।