Russia Sanctions Bill: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ पर हस्ताक्षर कर इसे कानून बना दिया है. इस…
Russia Sanctions Bill: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ पर हस्ताक्षर कर इसे कानून बना दिया है. इस कानून से रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के साथ-साथ उन देशों के खिलाफ भी कार्रवाई का रास्ता खुल गया है, जो बड़े पैमाने पर रूस से तेल और गैस खरीदते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में ऐसे देशों के सामान पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है. हालांकि, सबसे जरूरी बात यह है कि भारत पर अभी 100% टैरिफ नहीं लगाया गया है. कानून केवल अमेरिकी प्रशासन को ऐसा करने की कानूनी शक्ति देता है
भारत के लिए यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि 2022 के बाद से रूस भारत के कच्चे तेल के बड़े स्रोतों में शामिल हो गया है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर अमेरिका भारत पर भारी टैरिफ लगाता है तो इसका असर भारतीय कारोबार, रुपये, महंगाई और आम लोगों पर कैसे पड़ेगा
इस कानून का मकसद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है. इसके तहत रूस के अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों, रक्षा से जुड़े नेटवर्क और तेल ले जाने वाले तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर प्रतिबंधों को मजबूत किया गया है
कानून की एक अहम व्यवस्था अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े आयातक देशों के सामान पर कुछ परिस्थितियों में 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति देती है
इसके अलावा रूस के प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले देशों और संस्थाओं को भी निशाना बनाने का प्रावधान है. ईरान पर लागू कुछ अमेरिकी प्रतिबंधों को भी पांच साल के लिए बढ़ाया गया है
यह सबसे महत्वपूर्ण बात है. कानून लागू होने के बाद भारत पर अपने आप 100% टैरिफ नहीं लग गया है. राष्ट्रपति ट्रंप को यह अधिकार मिला है कि कानून में तय शर्तें पूरी होने पर वह इस तरह का टैरिफ लगा सकते हैं
यानी अभी तीन चीजें अलग-अलग हैं
कानून में कुछ परिस्थितियों में राष्ट्रपति को छूट यानी waiver देने का अधिकार भी दिया गया है. इसलिए आगे का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रंप प्रशासन इन शक्तियों का इस्तेमाल किस तरह करता है
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने अपने कच्चे तेल पर भारी छूट दी. भारत की रिफाइनिंग कंपनियों ने इस मौके का इस्तेमाल करके रूस से बड़ी मात्रा में क्रूड खरीदना शुरू किया
युद्ध से पहले भारत के क्रूड आयात में खाड़ी देशों की हिस्सेदारी 55% से ज्यादा थी, जबकि रूस की हिस्सेदारी 15% से कम थी. इसके बाद तस्वीर काफी बदल गई
CREA के अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के समुद्री क्रूड निर्यात में चीन की हिस्सेदारी करीब 50% और भारत की 37% रही. यानी भारत रूस के कच्चे तेल का दुनिया के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है
भारत हालांकि सिर्फ रूस पर निर्भर नहीं है. देश अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, वेनेजुएला और अफ्रीकी देशों से भी क्रूड खरीदता है
अगर अमेरिका भारतीय सामान पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगाता है तो इसका सीधा असर पेट्रोल पंप पर नहीं पड़ेगा.100% टैरिफ का मतलब होगा कि अमेरिका में भारतीय सामान पहुंचने पर उस पर बहुत ज्यादा आयात शुल्क लग सकता है. इससे अमेरिका में भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं और भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है
इसका असर कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान, दवाइयों, जेम्स-ज्वेलरी और दूसरे निर्यात क्षेत्रों पर अलग-अलग पड़ सकता है. वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका कितना टैरिफ लगाता है, किन उत्पादों को इसमें शामिल करता है और इसे कब लागू करता है
अगर अमेरिकी टैरिफ के कारण भारत का अमेरिका को निर्यात घटता है और डॉलर की आमद पर दबाव पड़ता है, तो रुपये पर असर पड़ सकता है. दूसरी तरफ, अगर भारत रूस से कम तेल खरीदकर महंगे स्रोतों से ज्यादा क्रूड खरीदता है, तो देश का आयात बिल बढ़ सकता है.इससे भारत के चालू खाते, रुपये और महंगाई पर दबाव बनने की संभावना हो सकती है
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कानून लागू होते ही पेट्रोल, डीजल या रोजमर्रा की चीजें तुरंत महंगी हो जाएंगी. इसके लिए कई आर्थिक परिस्थितियां एक साथ बदलनी होंगी
भारत सरकार लगातार कहती रही है कि उसकी ऊर्जा नीति का मुख्य उद्देश्य देश की सस्ती, भरोसेमंद और लगातार ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना है. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत इस मामले में आगे के घटनाक्रम पर नजर रख रहा है और अपने व्यापार तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने भी कहा है कि भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा देश की बुनियादी जरूरत है
भारत के सामने इस समय दो स्तर पर चुनौती है. पहला, रूसी तेल की खरीद को लेकर अमेरिका का दबाव और दूसरा, अमेरिका के साथ भारत के बड़े व्यापारिक रिश्ते
अगर भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिका भारी टैरिफ लगाता है, तो भारतीय निर्यातकों पर असर पड़ सकता है. वहीं अगर भारत रूसी तेल खरीदना काफी कम कर देता है तो उसे दूसरे देशों से क्रूड खरीदना पड़ सकता है. अगर उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हुआ तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है
इसी वजह से यह मामला सिर्फ रूस और अमेरिका के बीच प्रतिबंधों का नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार नीति से भी जुड़ा हुआ है
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने नए कानून का स्वागत किया है और कहा है कि प्रतिबंध रूस पर दबाव बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं
वहीं रूस ने अमेरिकी कदम की आलोचना की है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने अतिरिक्त अमेरिकी प्रतिबंधों को रूस के खिलाफ ‘अमित्रतापूर्ण कार्रवाई’ बताया है और कहा है कि इससे यूक्रेन में शांति समझौते की कोशिशें और मुश्किल हो सकती हैं
चीन ने भी रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी टैरिफ के इस्तेमाल का विरोध किया है और इसे अमेरिकी ‘long-arm jurisdiction’ यानी दूसरे देशों के मामलों में अमेरिकी कानून का विस्तार बताया है
फिलहाल सबसे जरूरी बात यही है कि भारत पर 100% टैरिफ लागू नहीं हुआ है. नया अमेरिकी कानून सिर्फ ट्रंप प्रशासन को भविष्य में ऐसा कदम उठाने की शक्ति देता है
आगे भारत पर असर मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करेगा
यानी अभी इसे ‘भारत पर 100% अमेरिकी टैरिफ लागू’ कहना सही नहीं होगा. फिलहाल कानून ने सिर्फ ऐसा करने का रास्ता खोला है. असली असर अमेरिकी प्रशासन के अगले फैसलों और भारत की ऊर्जा व व्यापार नीति पर निर्भर करेगा





