आरक्षण के मुद्दे पर फिर घिरी BJP? वी.पी. सिंह से मोदी तक, क्या बदल रहा है सियासी समीकरण?

Reservation Politics in India: भारतीय राजनीति में आरक्षण का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है। चुनावी राजनीति में इसका असर सिर्फ सामाजिक समीकरणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई बार इसने सरकारों की दिशा और राजनीतिक दलों की रणनीति को भी प्रभावित किया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या आरक्षण एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में पहुंच रहा है?

90 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के बाद भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला था। आज, तीन दशक से ज्यादा समय बाद, आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में दिखाई दे रहा है।

1990 में मंडल आयोग के फैसले ने बदल दी थी राजनीति

साल 1990 में प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए केंद्रीय सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू करने का फैसला किया।

यह फैसला सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए ऐतिहासिक माना गया, लेकिन इसके खिलाफ देश के कई हिस्सों में व्यापक विरोध प्रदर्शन भी हुए। सामान्य वर्ग के छात्रों और युवाओं के बीच इसका खासा विरोध देखने को मिला और देश की राजनीति में तीखी बहस शुरू हो गई। इसी दौर में बीजेपी ने वी.पी. सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद सरकार अल्पमत में आ गई और नवंबर 1990 में वी.पी. सिंह को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ हालांकि यह कहना कि उनकी पूरी राजनीतिक पहचान केवल आरक्षण के फैसले के कारण समाप्त हो गई, एक राजनीतिक व्याख्या होगी। वी.पी. सिंह भारतीय राजनीति में मंडल राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में जरूर दर्ज हुए, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण घटनाएं और परिस्थितियां थीं।

मंडल आयोग के लागू होने के बाद देश की राजनीति में OBC समुदाय की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व का मुद्दा पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। कई राज्यों में पिछड़े वर्गों की राजनीति मजबूत हुई और नए राजनीतिक दलों तथा नेताओं का उदय हुआ।

इसके साथ ही सामान्य वर्ग की राजनीति और आरक्षण की सीमा को लेकर भी लगातार बहस चलती रही। यही वजह है कि आरक्षण आज भी भारतीय चुनावी राजनीति के सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल है। मोदी सरकार के सामने भी आरक्षण का सियासी सवाल अब मौजूदा दौर में आरक्षण को लेकर बीजेपी के सामने अलग तरह की चुनौती दिखाई देती है।

विपक्षी दलों ने पिछले कुछ चुनावों में संविधान और आरक्षण की सुरक्षा को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाया है। दूसरी ओर, बीजेपी के भीतर और उसके समर्थक वर्गों के बीच भी आरक्षण व्यवस्था, सरकारी नौकरियों, शिक्षा और सामान्य वर्ग से जुड़े मुद्दों को लेकर अलग-अलग मांगें सामने आती रही हैं। कुछ सवर्ण संगठनों और नेताओं की ओर से राष्ट्रीय सवर्ण आयोग जैसी मांगें भी समय-समय पर उठती रही हैं। ऐसे में बीजेपी के सामने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती यह है कि वह सामाजिक न्याय और आरक्षण से जुड़े अपने व्यापक सामाजिक गठबंधन को बनाए रखते हुए सामान्य वर्ग की चिंताओं को भी किस तरह संबोधित करती है।

क्या सवर्ण नाराजगी बीजेपी के लिए चुनौती है?

ब्राह्मण और ठाकुर समेत विभिन्न सवर्ण समुदायों के बीच आरक्षण और दूसरे सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को लेकर नाराजगी की चर्चाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा रही हैं। हालांकि किसी पूरे समुदाय को एकसमान राजनीतिक रुख वाला मानना उचित नहीं होगा। बीजेपी के लिए चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसका चुनावी आधार अलग-अलग सामाजिक वर्गों के समर्थन पर टिका है। पार्टी के सामने एक तरफ दलित और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ परंपरागत समर्थक वर्गों की अपेक्षाओं को भी संतुलित करना है।

क्या आरक्षण सरकारों के बनने और गिरने की सबसे बड़ी वजह है?

वी.पी. सिंह सरकार के पतन को सिर्फ आरक्षण के फैसले से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। उस समय राम जन्मभूमि आंदोलन, बीजेपी का समर्थन वापस लेना और राष्ट्रीय राजनीति में बदलते गठबंधन जैसे कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम भी समानांतर रूप से चल रहे थे।

इसी तरह आज भी किसी सरकार की चुनावी सफलता या असफलता के पीछे सिर्फ आरक्षण को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। बेरोजगारी, महंगाई, विकास, जातीय समीकरण, नेतृत्व, स्थानीय मुद्दे और राजनीतिक गठबंधन जैसे कई कारक चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। फिर भी यह जरूर कहा जा सकता है कि आरक्षण भारतीय राजनीति का ऐसा मुद्दा है, जिसे कोई भी राजनीतिक दल नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बेहद व्यापक हैं।

आने वाले समय में क्या होगा बीजेपी का सियासी समीकरण?

आने वाले चुनावों में आरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दे किस तरह राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित करते हैं, यह देखने वाली बात होगी। बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संतुलन बनाए रखने की हो सकती है। क्या पार्टी सामान्य वर्ग की नाराजगी को दूर करने के साथ-साथ OBC, SC और ST मतदाताओं के बीच अपना समर्थन मजबूत रख पाएगी? क्या विपक्ष का संविधान और आरक्षण वाला नैरेटिव आगे भी प्रभावी रहेगा? और क्या आरक्षण आने वाले चुनावों में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनेगा? इन सवालों के जवाब आने वाले समय की राजनीति में दिखाई देंगे।

आपकी राय क्या है? क्या आपको लगता है कि आरक्षण भारत में सरकारों के बनने और बिगड़ने में एक बड़ी भूमिका निभाता है? वी.पी. सिंह से लेकर नरेंद्र मोदी के दौर तक आरक्षण की राजनीति में आपको क्या बदलाव दिखाई देता है? क्या ब्राह्मण, ठाकुर और दूसरे सवर्ण वर्गों से जुड़े मुद्दे बीजेपी के लिए आने वाले समय में चुनौती बन सकते हैं? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।