उत्तराखंड की सियासत में एक ऐसी विधानसभा सीट… जहां कांग्रेस की विरासत है, बीजेपी की पूरी ताकत है और हर चुनाव के साथ बदलता हुआ सियासी मिजाज है! जी हां, बात हो रह…
उत्तराखंड की सियासत में एक ऐसी विधानसभा सीट… जहां कांग्रेस की विरासत है, बीजेपी की पूरी ताकत है और हर चुनाव के साथ बदलता हुआ सियासी मिजाज है! जी हां, बात हो रही है हल्द्वानी विधानसभा सीट की… जहां 2027 में सिर्फ विधायक चुनने की लड़ाई नहीं होगी, बल्कि कांग्रेस के सियासी वर्चस्व और बीजेपी की प्रतिष्ठा का भी इम्तिहान होगा!सबसे बड़ा सवाल… क्या सुमित हृदयेश अपनी मां इंदिरा हृदयेश की राजनीतिक विरासत को तीसरी बार कांग्रेस की जीत में बदल पाएंगे, या बीजेपी इस बार ऐसा दांव चलेगी कि हल्द्वानी में सत्ता का समीकरण ही पलट जाएगा?हल्द्वानी की सियासत को समझना है, तो पिछले दो चुनावों के नतीजों पर नजर डालिए!2017 में मोदी लहर के बीच भी कांग्रेस की दिग्गज नेता इंदिरा हृदयेश ने बीजेपी को शिकस्त दी। और फिर 2022 में उनके बेटे सुमित हृदयेश ने मैदान संभाला… मुकाबला हुआ, बीजेपी ने पूरी ताकत लगाई, लेकिन बाजी फिर कांग्रेस के हाथ लगी। सुमित ने बीजेपी के जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला को 7,814 वोटों से हराकर साबित कर दिया कि हल्द्वानी में कांग्रेस की पकड़ को कमजोर समझना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा!
एक तरफ कांग्रेस के सामने अपनी सीट बचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ बीजेपी के सामने सवाल है कि आखिर हल्द्वानी में जीत का रास्ता कैसे निकले? क्या पार्टी पुराने चेहरे पर भरोसा करेगी या किसी नए चेहरे के जरिए चुनावी पिच पर बड़ा उलटफेर करने की कोशिश करेगी? टिकट की रणनीति और संगठन की एकजुटता यहां निर्णायक साबित हो सकती है।रेलवे भूमि विवाद, अतिक्रमण का सवाल और फरवरी 2024 की हिंसा… इन घटनाओं ने हल्द्वानी की राजनीति में कानून-व्यवस्था, न्याय और पुनर्वास जैसे मुद्दों को बेहद अहम बना दिया है। बीजेपी इन मुद्दों पर सख्त कार्रवाई और कानून-व्यवस्था को चुनावी विमर्श में आगे रख सकती है, जबकि कांग्रेस सरकार की कार्रवाई, प्रभावित लोगों के सवालों और न्याय के मुद्दे पर उसे घेरने की कोशिश कर सकती है।
लेकिन क्या हल्द्वानी का चुनाव सिर्फ ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द सिमट जाएगा? बिल्कुल नहीं! क्योंकि यहां की जनता के सामने ट्रैफिक जाम, पार्किंग की समस्या, जलभराव और बुनियादी सुविधाओं का सवाल भी है। चुनावी भाषणों में बड़े-बड़े दावे करने वाले नेताओं को इन सवालों का जवाब देना ही पड़ेगा।हल्द्वानी में अलग-अलग समुदायों, व्यापारियों, पहाड़ से आए परिवारों और शहरी मतदाताओं की भूमिका अहम है। कांग्रेस को अपने पुराने समर्थकों के साथ व्यापक शहरी समर्थन बनाए रखना होगा, जबकि बीजेपी को अपने समर्थक आधार को मजबूत करते हुए नए मतदाताओं का भरोसा जीतना होगा। यहां किसी एक समुदाय के वोट को पूरी तरह किसी एक पार्टी के खाते में मान लेना चुनावी तस्वीर को गलत तरीके से पेश करना होगा।सुमित हृदयेश के सामने अपनी राजनीतिक पकड़ साबित करने की चुनौती होगी, तो बीजेपी के सामने कांग्रेस के इस मजबूत गढ़ में सेंध लगाने का मौका। लेकिन अंतिम फैसला नारों से नहीं, उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों, संगठन की ताकत और मतदाताओं के रुख से तय होगा।अब सवाल आपसे है 2027 में हल्द्वानी में कांग्रेस अपनी जीत का सिलसिला कायम रखेगी या बीजेपी इस बार बाजी पलट देगी?






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