उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ सीटें ऐसी हैं, जहां जीत और हार का फैसला लाखों वोटों से नहीं… महज कुछ सौ वोटों से होता है! और फिरोजाबाद की जसराना विधानसभा सीट भी…
उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ सीटें ऐसी हैं, जहां जीत और हार का फैसला लाखों वोटों से नहीं… महज कुछ सौ वोटों से होता है! और फिरोजाबाद की जसराना विधानसभा सीट भी ऐसी ही एक सियासी रणभूमि है, जहां 2022 में बीजेपी के हाथ से जीत फिसली तो सिर्फ 836 वोटों के अंतर से!अब सवाल है… 2027 में क्या बीजेपी इस हार का हिसाब चुकता करेगी, या सचिन यादव एक बार फिर कमल के सामने साइकिल की रफ्तार बढ़ाकर अपना किला बचा लेंगे?
जसराना में मुकाबला सिर्फ दो पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि जातीय समीकरणों, वोटों की गोलबंदी और राजनीतिक रणनीति का है। यहां एक छोटी-सी चूक भी किसी पार्टी के अरमानों पर पानी फेर सकती है!पहले चुनावी इतिहास समझिए!2017 में बीजेपी के रामगोपाल पप्पू लोधी ने सपा के शिवप्रताप सिंह को 20 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर जसराना में कमल खिलाया था। लेकिन 2022 में तस्वीर पलट गई! सपा के सचिन यादव ने बीजेपी के मानवेन्द्र प्रताप सिंह को महज 836 वोटों से शिकस्त देकर सीट अपने नाम कर ली।यानी पांच साल में मुकाबला ऐसा बदला कि बड़ी जीत का अंतर सिमटकर कुछ सौ वोटों पर आ गया!और अब 2027 में बीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल है क्या वह फिर से 2017 वाला प्रदर्शन दोहरा पाएगी, या जसराना में सपा की पकड़ और मजबूत होगी?यादव मतदाताओं को सपा का अहम आधार माना जाता है, जबकि लोधी और दूसरे गैर-यादव ओबीसी समुदायों में बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर सकती है। दलित, बघेल, शाक्य, सवर्ण और मुस्लिम मतदाताओं का रुख भी मुकाबले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।लेकिन यहां एक बात समझ लीजिए—सिर्फ जातियों का गणित जोड़ लेने से चुनाव नहीं जीता जाता। असली खेल तब बनता है, जब ये वोट मतदान के दिन किस उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट होते हैं!सपा के लिए सचिन यादव की चुनौती है अपने समर्थक आधार को बरकरार रखना और PDA के समीकरण को जमीन पर मजबूत करना। वहीं बीजेपी के सामने चुनौती है गैर-यादव ओबीसी और दूसरे वर्गों का समर्थन जुटाकर सपा की बढ़त को तोड़ना।
और इस पूरी लड़ाई में तीसरा कोण भी बेहद अहम है बीएसपी!अगर बीएसपी मजबूत प्रत्याशी उतारकर अपने वोटों में बढ़ोतरी करती है, तो मुकाबले का गणित बदल सकता है। वहीं उसके वोटों का बंटवारा किस तरफ कितना असर डालेगा, यह उम्मीदवार और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।अब 2024 के लोकसभा चुनाव का रुझान भी गौर करने लायक है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जसराना विधानसभा क्षेत्र में सपा को बीजेपी से करीब 26 हजार वोट ज्यादा मिले। यह सपा के लिए उत्साह बढ़ाने वाला संकेत जरूर है, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे, उम्मीदवार और मतदान का पैटर्न अलग हो सकता है।यानी जसराना में 2027 की लड़ाई तीन सवालों पर टिकेगी सपा अपना वोट बैंक बचा पाएगी? बीजेपी जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में जोड़ पाएगी? और बीएसपी किसका खेल बिगाड़ेगी?कमेंट करके अपनी राय जरूर बताइए!






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