प्रतापगढ़: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी सरगर्मी धीरे-धीरे तेज होने लगी है। प्रतापगढ़ की रानीगंज विधानसभा सीट भी उन सीटों में शामिल है, जहां…

प्रतापगढ़: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी सरगर्मी धीरे-धीरे तेज होने लगी है। प्रतापगढ़ की रानीगंज विधानसभा सीट भी उन सीटों में शामिल है, जहां पिछले चुनावों के नतीजों ने राजनीतिक दलों को लगातार चौंकाया है। यहां मतदाताओं ने किसी एक दल पर लगातार भरोसा नहीं जताया है। 2012 में समाजवादी पार्टी, 2017 में भारतीय जनता पार्टी और 2022 में एक बार फिर सपा की जीत ने रानीगंज को दिलचस्प चुनावी सीट बना दिया है।

अब 2027 में सियासी मुकाबला एक बार फिर दिलचस्प होने के आसार हैं। मौजूदा सपा विधायक डॉ. आरके वर्मा अपनी सीट बचाने की कोशिश में जुटे हैं, जबकि बीजेपी के धीरज ओझा पिछली हार के बाद वापसी की रणनीति तैयार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या रानीगंज इस बार भी अपना चुनावी रुख बदलेगी?

रानीगंज विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी और 2012 में यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुआ। पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रोफेसर शिवाकांत ओझा ने जीत दर्ज की थी।

इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के धीरज ओझा ने सपा को शिकस्त देकर सीट पर कब्जा किया। हालांकि, 2022 में एक बार फिर चुनावी तस्वीर बदल गई। सपा के डॉ. आरके वर्मा ने बीजेपी उम्मीदवार को हराकर सीट वापस सपा के खाते में डाल दी।

इस चुनावी इतिहास के चलते रानीगंज में 2027 का मुकाबला और महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां अब तक किसी एक पार्टी का लगातार दो चुनाव जीतना आसान नहीं रहा है।

मौजूदा विधायक डॉ. आरके वर्मा के सामने 2027 में अपनी सीट बचाने की चुनौती होगी। सपा की रणनीति बेरोजगारी, महंगाई, आरक्षण, जातिगत जनगणना और संविधान जैसे मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में रखने की हो सकती है।

इसके साथ ही विधायक के सामने स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने और जनता के बीच अपने काम को प्रभावी तरीके से पहुंचाने की चुनौती होगी। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे भी चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

दूसरी तरफ बीजेपी 2027 में रानीगंज सीट पर दोबारा कब्जा जमाने की कोशिश करेगी। पार्टी के लिए धीरज ओझा एक प्रमुख चेहरा हैं, जो 2017 में यहां जीत हासिल कर चुके हैं।

पिछली हार के कारणों की समीक्षा के साथ बीजेपी संगठन और बूथ स्तर पर अपनी तैयारियों को मजबूत करने पर जोर दे सकती है। स्थानीय गुटबाजी को साधना और अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच समर्थन बढ़ाना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा।

रानीगंज का चुनावी गणित केवल सपा और बीजेपी के बीच सीधी टक्कर तक सीमित नहीं है। करीब 3.34 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर विभिन्न सामाजिक समूहों की भूमिका अहम मानी जाती है।

क्षेत्र में करीब 80 हजार ब्राह्मण, लगभग 60 हजार यादव और करीब 60 हजार कुर्मी, निषाद तथा प्रजापति जैसे पिछड़े वर्ग के मतदाता बताए जाते हैं। वहीं करीब 45 हजार अनुसूचित जाति के मतदाता भी चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन भी कई क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

ऐसे में 2027 में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि कौन-सी पार्टी ब्राह्मण, पिछड़ा, दलित और मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत सामाजिक समीकरण तैयार कर पाती है।

बीजेपी के सामने मजबूत उम्मीदवार के साथ संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि सपा को मौजूदा विधायक के पक्ष में माहौल बनाए रखने के साथ अपने सामाजिक आधार को मजबूत करना होगा।

रानीगंज में सड़क, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, रोजगार, किसानों से जुड़े सवाल और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।

कुल मिलाकर, रानीगंज विधानसभा चुनाव 2027 में मुकाबला सिर्फ सपा और बीजेपी के बीच नहीं होगा, बल्कि सामाजिक समीकरण, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, संगठन की ताकत और स्थानीय मुद्दों का भी बड़ा इम्तिहान होगा। अब देखना यह है कि क्या डॉ. आरके वर्मा रानीगंज के चुनावी इतिहास को बदलकर लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर पाते हैं, या धीरज ओझा बीजेपी की वापसी कराने में सफल होते हैं। या फिर कोई नया सामाजिक समीकरण दोनों दलों के चुनावी गणित को ही बदल देगा।