उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां तेज होने लगी हैं। चुनाव में अभी समय बाकी है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपन…
उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां तेज होने लगी हैं। चुनाव में अभी समय बाकी है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी की कोशिश में जुटी बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सहयोगी दलों के साथ सीटों का संतुलन तय करना है।
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403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में इस बार बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का कुनबा पहले की तुलना में बड़ा है। ऐसे में सीट बंटवारे को लेकर सहयोगी दलों की मांग और बीजेपी की चुनावी रणनीति के बीच तालमेल बैठाना अहम होगा।
सियासी गलियारों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव में 300 से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर सकती है। वहीं, करीब 70 से 80 सीटें एनडीए के सहयोगी दलों के खाते में जाने की संभावना जताई जा रही है। एनडीए में इस समय राष्ट्रीय लोक दल (RLD), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), निषाद पार्टी और अपना दल (एस) प्रमुख सहयोगी हैं। बीजेपी इन दलों को उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों में सीटें देकर गठबंधन को मजबूत रखने की कोशिश कर सकती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी की आरएलडी का प्रभाव माना जाता है। वहीं पूर्वांचल में ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और संजय निषाद की निषाद पार्टी अपने-अपने सामाजिक आधार के चलते अहम भूमिका निभा सकती हैं। मिर्जापुर और आसपास के क्षेत्रों में अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) भी बीजेपी की महत्वपूर्ण सहयोगी है।हालांकि अभी तक सीटों का कोई आधिकारिक बंटवारा सामने नहीं आया है। संभावित फॉर्मूले में इन चारों दलों को उनके प्रभाव वाले इलाकों के साथ-साथ उन सीटों पर भी मौका दिए जाने की चर्चा है, जहां बीजेपी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा है।
सीट बंटवारे में एक और फॉर्मूले पर चर्चा की जा रही है। इसके तहत करीब 20 से 30 सीटों पर उम्मीदवार और चुनाव चिह्न के स्तर पर अलग रणनीति अपनाई जा सकती है। यानी किसी सीट पर उम्मीदवार बीजेपी का हो, लेकिन चुनाव चिह्न सहयोगी दल का इस्तेमाल किया जाए या सहयोगी दल के उम्मीदवार को बीजेपी के सिंबल पर मैदान में उतारा जाए। हालांकि यह अभी संभावित रणनीति का हिस्सा है और इस पर अंतिम फैसला गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बाद ही होगा।
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 376 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। उस समय अपना दल (एस) और निषाद पार्टी उसके प्रमुख सहयोगी थे और दोनों दलों को मिलाकर करीब 27 सीटें दी गई थीं। अब 2027 में समीकरण बदल चुके हैं। जयंत चौधरी की आरएलडी और ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा भी एनडीए का हिस्सा हैं। ऐसे में सहयोगी दलों की सीटों की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ने की उम्मीद है।
सहयोगी दल चाहेंगे अपनी पसंद की सीटें
एनडीए के क्षेत्रीय सहयोगी खासतौर पर उन विधानसभा सीटों पर दावेदारी कर सकते हैं जहां उनका सामाजिक और क्षेत्रीय आधार मजबूत है। इसके अलावा ऐसी सीटों पर भी उनकी नजर होगी जहां बीजेपी लगातार कमजोर रही है या उसे जीत हासिल नहीं हुई है। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि सहयोगियों को पर्याप्त सीटें देने के बावजूद वह अपनी संगठनात्मक ताकत और चुनावी लक्ष्य के अनुरूप सीटों पर नियंत्रण बनाए रखे।
संभावित सीट बंटवारे की चर्चा के बीच समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने बीजेपी पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि बीजेपी अपने सहयोगियों को उनकी अपेक्षा के मुताबिक सीटें नहीं देना चाहती। विपक्ष का यह भी दावा है कि एनडीए का गठबंधन विचारधारा से ज्यादा सत्ता और चुनावी फायदे पर आधारित है। विपक्षी नेताओं के मुताबिक सीटों के बंटवारे के दौरान सहयोगी दलों के बीच मतभेद सामने आ सकते हैं। फिलहाल 2027 के चुनाव के लिए एनडीए का आधिकारिक सीट-शेयरिंग फॉर्मूला सामने नहीं आया है। लेकिन शुरुआती चर्चाओं से इतना साफ है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के बीच सीटों को लेकर बातचीत आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है।





