पटना: बिहार की सियासत में विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। इस बार बहस सिर्फ विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच नहीं, बल्कि NDA…

पटना: बिहार की सियासत में विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। इस बार बहस सिर्फ विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच नहीं, बल्कि NDA के भीतर ही मतभेद सामने आने लगे हैं। अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण में ‘कोटे के अंदर कोटा’ यानी उप-श्रेणी बनाने के सवाल पर केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान तथा हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं।मामला इतना बढ़ गया कि आरक्षण पर अलग-अलग राय रखने वाले दोनों नेताओं के बीच बहस इस्तीफे की चुनौती तक पहुंच गई है। इससे बिहार चुनाव से पहले NDA के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

चिराग पासवान का तर्क है कि SC आरक्षण के भीतर अलग-अलग उप-श्रेणियां बनाने से अनुसूचित जाति समुदाय के भीतर विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है। उनका मानना है कि आरक्षण व्यवस्था में बदलाव को लेकर ऐसा कदम सामाजिक रूप से संवेदनशील मुद्दे को और जटिल बना सकता है।चिराग ने SC आरक्षण में उप-कोटे के बजाय क्रीमी लेयर जैसे विकल्प पर चर्चा की जरूरत बताई। उन्होंने उप-कोटे का समर्थन करने वाले नेताओं के रुख पर सवाल उठाते हुए यहां तक कहा कि यदि कोई नेता इस व्यवस्था का समर्थन करता है तो उसे अपने पद से इस्तीफा देकर इस मुद्दे पर आगे बढ़ना चाहिए।

चिराग पासवान के बयान पर पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। मांझी ने पलटवार करते हुए चिराग से ही इस्तीफा देने की मांग कर दी।मांझी का कहना है कि अनुसूचित जाति वर्ग के भीतर भी कई ऐसी जातियां हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़ी हुई हैं। उनके मुताबिक, आरक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ सभी वंचित समुदायों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसे में SC वर्ग के भीतर जरूरतमंद और अधिक वंचित समुदायों तक लाभ पहुंचाने के लिए उप-कोटे पर विचार जरूरी है।

मांझी के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने भी इस बहस में अपनी बात रखी है। उन्होंने मुसहर, भुइयां, नट और डोम जैसे समुदायों का उदाहरण देते हुए कहा कि SC वर्ग के भीतर भी कुछ समुदायों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व और सरकारी लाभ नहीं मिल पाया है।उनका तर्क है कि SC आरक्षण में उप-कोटा और क्रीमी लेयर दो अलग-अलग विषय हैं, इसलिए दोनों को एक-दूसरे के विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

आरक्षण के मुद्दे पर सामने आया यह मतभेद बिहार में NDA के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक तरफ चिराग पासवान दलित समाज के भीतर विभाजन की आशंका जता रहे हैं, वहीं जीतन राम मांझी और उनके समर्थक सबसे अधिक वंचित समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने की बात कर रहे हैं।बिहार में दलित और महादलित समुदाय लंबे समय से चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ऐसे में आरक्षण से जुड़ा कोई भी बड़ा मुद्दा सीधे चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

बिहार विधानसभा चुनाव के माहौल में NDA के भीतर आरक्षण जैसे मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर अलग-अलग राय सामने आना राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बन सकता है। विपक्ष इन बयानों को NDA के भीतर मतभेद के तौर पर पेश कर सकता है।हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच यह टकराव NDA के भीतर किसी बड़े राजनीतिक संकट में बदलेगा। लेकिन इतना जरूर है कि SC आरक्षण में कोटे के अंदर कोटा का मुद्दा बिहार चुनाव में सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी की बहस को और तेज कर सकता है।अब देखना होगा कि NDA नेतृत्व इस मतभेद को किस तरह संभालता है और क्या चुनाव से पहले इस मुद्दे पर सहयोगी दलों के बीच कोई साझा रुख सामने आता है।