Who Decides Bollywood Film Title: फिल्म बनाना सिर्फ कैमरे के सामने एक्टर्स को एक्टिंग करना और उसे कैमरे के पीछे से शूटिंग करने तक नहीं होती हैं. किसी फिल्म की…
Who Decides Bollywood Film Title: फिल्म बनाना सिर्फ कैमरे के सामने एक्टर्स को एक्टिंग करना और उसे कैमरे के पीछे से शूटिंग करने तक नहीं होती हैं. किसी फिल्म की पहचान सबसे पहले उसके टाइटल से बनती है. लोग फिल्म का पोस्टर या ट्रेलर आने से पहले कई बार सिर्फ उसके नाम से अंदाजा लगाने लगते हैं कि मूवी किस बारे में है. यही वजह है कि बॉलीवुड में फिल्म का टाइटल चुनना भी एक प्रोसेस की तरह होता है. कई बार फिल्म का नाम कहानी के हिसाब से रखा जाता है. तो कई बार मेकर्स ऐसा नाम डिसाइड करते हैं जो छोटा हो, आसानी से याद रहे और ऑडियंस को पसंद आए
बहरहाल, क्या फिल्म का नाम सिर्फ डायरेक्टर तय करता है? ऐसा जरूरी नहीं है. एक फिल्म के टाइटल के पीछे प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, राइटर, क्रिएटिव टीम, मार्केटिंग टीम और कई बार खुद एक्टर्स की भी राय ली जाती है. इसके बाद टाइटल को लेकर रजिस्ट्रेशन और कानूनी पहलुओं की तरफ बढ़ा जाता है. आइए समझते हैं कि बॉलीवुड फिल्म का टाइटल तय होने से लेकर उसके फाइनल होने तक पूरा प्रोसेस क्या-क्या होता है
किसी फिल्म का टाइटल तय करने के लिए पहले उसकी कहानी को ध्यान में रखा जाता है. राइटर जब कहानी या स्क्रीनप्ले तैयार करता है, तब उसके दिमाग में फिल्म के किरदार, उसका वर्ल्ड और कहानी का मैन आइडिया होता है. ऐसे में कई बार कहानी का सबसे अहम किरदार, कोई इंसिडेंट, लोकेशन या कोई खास लाइन ही फिल्म के नाम का टाइटल बन जाती है. उदाहरण के तौर पर अगर पूरी फिल्म किसी एक किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है, तो उस किरदार का नाम ही टाइटल बन सकता है. वहीं अगर कहानी किसी खास रिलेशनशिप, इंसिडेंट या आइडिया पर बेस्ड है, तो उसी से जुड़ा कोई नाम का टाइटल बनाया जा सकता है. हालांकि शुरुआती नाम हमेशा फाइनल नहीं होता. कहानी पर करने के साथ टाइटल भी बदल सकता है
फिल्म की कहानी तैयार करने वाले राइटर के पास टाइटल का शुरुआती आइडिया भी हो सकता है क्योंकि वह फिल्म की पूरी कहानी के इमोशन को बेहतर समझता है. डायरेक्टर भी टाइटल को लेकर अपनी राय देता है, क्योंकि उसे पता होता है कि फिल्म को पर्दे पर किस तरह दिखाया जाएगा. कई बार राइटर कई नाम सुझाता है और डायरेक्टर उनमें से किसी एक को पसंद करता है. कुछ फिल्मों में डायरेक्टर खुद टाइटल सुझा सकता है. इसके बाद प्रोड्यूसर और फिल्म की बाकी क्रिएटिव टीम के साथ इस पर चर्चा होती है. यानी टाइटल चुनना हमेशा किसी एक का फैसला हो, यह जरूरी नहीं है
फिल्म का प्रोड्यूसर प्रोजेक्ट की पूरे फाइनेंशियल से जुड़ी चीजों को देखता है. इसलिए टाइटल को लेकर उसकी राय भी इंपोर्टेंट होती है. ऐसे में प्रोड्यूसर यह देख सकता है कि फिल्म के लिए जो टाइटल का आइडिया दिया गया है कि वो कहानी के साथ कितना फिट बैठता है और मार्केटिंग के लिहाज से कैसा रहेगा. मान लीजिए किसी फिल्म की कहानी सीरियस किस्म की है, लेकिन उसका नाम ऐसा है जिसे सुनकर ऑडियंस को कॉमेडी फिल्म लगे. ऐसे में टाइटल को लेकर दोबारा सोचा जा सकता है. इसी तरह बहुत मुश्किल या लंबे नाम को भी बदला जा सकता है क्योंकि उसे याद रखना और प्रमोशन में यूज करना मुश्किल हो सकता है
आज के समय में फिल्म की मार्केटिंग सिर्फ पोस्टर और थिएटर रिलीज तक सीमित नहीं होती है. सोशल मीडिया, ट्रेलर, टीजर, गाने और डिजिटल प्रमोशन फिल्म की पहुंच बढ़ाने में बड़ा रोल होता है. इसलिए कई प्रोडक्शन हाउस टाइटल को मार्केटिंग के नजरिए से भी देखते हैं. मार्केटिंग टीम यह समझने की कोशिश करती है कि नाम लोगों को आसानी से याद होगा या नहीं, टाइटलल को सोशल मीडिया पर यूज करना आसान होगा या नहीं और फिल्म की बाकी प्रमोशनल के लिए वह टाइटल कितना अच्छा बैठेगा. इसका मतलब यह नहीं कि मार्केटिंग टीम अकेले फिल्म का नाम तय करती है. बल्कि उसकी राय उनकी राय को अहमियत दी जाती है, जिससे फिल्म की मार्केटिंग में किसी तरह की दिक्कत न आए
अगर फिल्म में कोई बड़ा स्टार है, तो कई बार उनकी भी राय ली जाता है. आखिर फिल्म का टाइटल उसी स्टार के प्रमोशन का भी हिस्सा बनने वाला होता है. लेकिन यह हर फिल्म के टाइटल के लिए ऐसा जरूरी नहीं है. किसी एक्टर को कोई नाम पसंद आ सकता है या वह किसी दूसरे नाम को लेकर सुझाव दे सकता है. हालांकि, अंतिम फैसला प्रोडक्शन टीम और फिल्म बनाने वालों के हाथों में होता है. इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि हर बड़े स्टार खुद अपनी फिल्म का टाइटल तय करता है
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म बनने के दौरान उसका टाइटल एक से ज्यादा बार बदल सकता है. शुरुआत में राइटर या डायरेक्टर किसी अस्थायी नाम से स्क्रिप्ट पर काम कर सकते हैं. बाद में जब फिल्म का फाइनल रूप सामने आता है, तो वे दूसरा नाम फाइनल कर सकते हैं. कई बार शूटिंग शुरू होने के बाद भी टाइटल पर दोबारा विचार होता है. कभी फिल्म के जॉनर में बदलाव होता है, कभी कहानी बदल जाती है. इतना ही नहीं कभी मेकर्स को लगता है कि नया नाम ऑडियंस को ज्यादा पसंद आएगा. इसलिए टाइटल एक से ज्यादा बदल सकता है
फिल्म टाइटल फाइनल होने के बाद सिर्फ यह तय कर लेना काफी नहीं होता कि फिल्म इसी नाम से रिलीज होगी. मेकर्स को यह भी देखना होता है कि उस नाम से पहले कोई दूसरी फिल्म या प्रोजेक्ट जुड़ा हुआ तो नहीं है. फिल्म टाइटल के यूज को लेकर फिल्म संस्थाओं और इंडस्ट्री की प्रक्रियाओं के तहत जांच और रजिस्ट्रेशन की जरूरत होती है. इसी चरण में यह भी देखा जाता है कि चुना गया नाम किसी टाइटल से इतना मिलता-जुलता तो नहीं, जिससे आगे विवाद खड़ा न हो. यही वजह है कि कई बार किसी फाइनल नाम को छोड़कर दूसरा टाइटल तय करना पड़ता है
फिल्म का नाम सिर्फ एक क्रिएटिव आइडिया नहीं होता. वह फिल्म की पहचान और बिजनेस ब्रांड का हिस्सा होती है. इसलिए ट्रेडमार्क और दूसरे कानूनी पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाता है. अगर किसी नाम को लेकर पहले से राइट्स हैं तो इसके इस्तेमाल पर कॉन्ट्रोवर्सी हो सकती है और प्रोडक्शन के लिए आगे परेशानी पैदा हो सकती है. इसलिए मेकर्स नाम फाइनल करने से पहले कानूनी जांच करते हैं. यही कारण है कि फिल्म इंडस्ट्री में टाइटल को लेकर शुरुआती चर्चा से लेकर फाइनल अनाउंसमेंट तक काफी ध्यान दिया जाता है




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