Uttarakhand News: असम की हालिया भारी बाढ़ से राज्य के कई गांवों के साथ-साथ जोरहाट जिले के तिताबोर का जुनाकीमंडल गांव भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जो कि CSIR स्…

Uttarakhand News: असम की हालिया भारी बाढ़ से राज्य के कई गांवों के साथ-साथ जोरहाट जिले के तिताबोर का जुनाकीमंडल गांव भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जो कि CSIR स्मार्ट विलेज मिशन का हिस्सा है. इस आपदा के कारण गांव के घरों, सड़कों, बिजली-पानी जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं और सरकारी व सामुदायिक केंद्रों को भारी नुकसान पहुंचा है

बाढ़ के बाद हालात सुधारने के लिए CSIR स्मार्ट विलेज मिशन ने जुनाकीमंडल गांव में जमीन पर उतरकर एक साथ काम शुरू किया है. इसका मकसद वैज्ञानिक तरीकों और आधुनिक तकनीक की मदद से लोगों को दोबारा बसाना, उनके लिए सुरक्षित घर बनाना और गांव को ऐसा मजबूत रूप देना है ताकि भविष्य में बाढ़ आने पर भी ज्यादा नुकसान न हो

स्मार्ट विलेज मिशन के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए CSIR-CBRI के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की एक खास टीम को बाढ़ प्रभावित गांव की जमीनी हकीकत जानने की जिम्मेदारी दी गई. इस टीम को मिशन निदेशक प्रो. प्रदीप कुमार रमनचारला और नोडल वैज्ञानिक डॉ. किशोर एस. कुलकर्णी की देखरेख में भेजा गया, ताकि वे गांव जाकर वैज्ञानिक तरीके से यह पता लगा सकें कि वहां के लोगों को इस समय किन चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत है

वैज्ञानिकों की टीम ने पूरे गांव का बारीकी से मुआयना किया और बाढ़ से मकानों के ढांचे और अन्य सामानों को पहुंचे नुकसान का जायजा लिया. इस जांच के दौरान उन्होंने मकानों के उन कमजोर हिस्सों की पहचान की, जिन्हें आगे खतरा हो सकता है. इसी सर्वे के आधार पर टीम ने सलाह दी है कि मौजूदा घरों को सुरक्षित और मजबूत बनाने के लिए उनकी मरम्मत, रेट्रोफिटिंग और सुदृढ़ीकरण कैसे किया जाए

गांव का सर्वे करने के बाद जुनाकीमंडल में "आवास सक्षम" नाम का एक कार्यक्रम रखा गया, जिसका मकसद प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत लोगों को सुरक्षित, सस्ते, टिकाऊ और बाढ़ जैसी आपदाओं से बचने वाले घर बनाने की जानकारी देना और नई तकनीकें दिखाना था।. इस जागरूकता कार्यक्रम में 150 से अधिक ग्रामीणों और लाभार्थियों ने हिस्सा लिया

इस इलाके में बार-बार आने वाली बाढ़ और पर्यावरण के खतरों को देखते हुए मकानों को सुरक्षित बनाने के लिए खास तकनीकों को अपनाने की सलाह दी गई. इसके तहत घरों की मरम्मत और मजबूत करने, मकान की नींव को पानी से बचाने के लिए 'प्लिंथ प्रोटेक्शन वॉल' बनाने, पानी में न बहने वाला मिट्टी का लेप (नॉन-इरोडेड मड प्लास्टर) लगाने, आग न पकड़ने वाली फायर-रिटार्डेंट थैच रूफ तैयार करने और बांस की मदद से सुरक्षित और लंबे समय तक चलने वाले घर बनाने जैसे उपायों पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया

कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने CSIR-CBRI द्वारा खोजी गई कई नई तकनीकों को चलाकर दिखाया, जिसमें 'हाइब्रिड सोलर वॉटर हीटिंग और स्पेस कंडीशनिंग' सबसे खास थी. गांव के स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्रों में बिजली की बचत करने और उन्हें आरामदायक बनाने के लिए प्रधान वैज्ञानिक डॉ. चंदन स्वरूप मीणा ने एक नया सुझाव दिया. उन्होंने सूरज की रोशनी से चलने वाली इस तकनीक की मदद से पानी गर्म करने, कमरों को मौसम के हिसाब से अनुकूल रखने और रसोई के कामों को आसान बनाने के उपाय बताए

स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए सुझाई गई यह खास सोलर प्रणाली साफ-सफाई व खाना पकाने के लिए गर्म पानी देगी, बहुत ज्यादा गर्मी या सर्दी में क्लासरूम के तापमान को आरामदायक रखेगी और बिना प्रदूषण फैलाए व कम खर्चे में मिड-डे मील पकाने में मदद करेगी. यह नई तकनीक पुराने तरीकों के मुकाबले बिजली और ईंधन की खपत को 75 प्रतिशत तक कम कर सकती है. साथ ही, इससे सरकारी बिजली और गैस-लकड़ी पर निर्भरता बहुत कम हो जाएगी, जिससे बिजली की भारी कटौती वाले ग्रामीण और बाढ़ प्रभावित इलाकों के लिए यह एक हमेशा काम आने वाला और मजबूत जरिया बनेगी

इस प्रणाली को CSIR-CBRI, रुड़की में पूरी तरह से अपने देश में बनाया और परखा गया है. इसे पहले ही हिमाचल प्रदेश के किन्नौर (कल्पा) और लेह-लद्दाख में ITBP के कैंपों में कामयाबी के साथ लगाया जा चुका है. अब यह तकनीक लैब से बाहर निकलकर आम जमीन पर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने के लिए पूरी तरह तैयार है. इस बेहतरीन तकनीक को प्रधान वैज्ञानिक डॉ. चंदन स्वरूप मीणा ने विकसित किया है

इसके अलावा, कार्यक्रम में गांवों के इस्तेमाल के लिए आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाई जा सकने वाली (पोर्टेबल) ईंट और ब्लॉक बनाने की मशीनें भी दिखाई गईं. लगभग 100 से 125 किलोग्राम वजन वाली ये मशीनें गांव में ही मिलने वाले सामान से काम करती हैं और इन्हें हाथ या बिजली दोनों से चलाया जा सकता है. यह मशीन सिर्फ 8 घंटे में 800 से 1000 ब्लॉक या 1800 से 2400 ईंटें बना सकती है, जो हाथ से ईंट बनाने के मुकाबले 3 से 4 गुना ज्यादा तेज है. इस तकनीक का प्रदर्शन मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम के गांवों में किया जा रहा है, जिससे गांव के लोगों को वहीं पर रोजगार मिलने की बड़ी उम्मीद है. इस तकनीक को डॉ. आर.एस. बिष्ट, डॉ. सिद्धार्थ और डॉ. एस.के. पाणिग्रही ने मिलकर बनाया है

इसके अलावा, गांव में हवा को साफ करने वाला एक अलग से चलने वाला 'एयर डिसइन्फेक्शन सिस्टम' लगाने का सुझाव दिया गया है. इस मशीन का मुख्य उद्देश्य उन बंद या कम हवादार कमरों की हवा को कीटाणुरहित करना है, जहां बाहर की ताजी हवा आसानी से नहीं आ पाती. इससे बाढ़ के बाद घरों के अंदर खराब होने वाली हवा की गुणवत्ता को सुधारने में बड़ी मदद मिलेगी. इस तकनीक का सुझाव और विकास वैज्ञानिक डॉ. तबिश ने किया है

इसके साथ ही, गांव और आस-पड़ोस के राजमिस्त्रियों व निर्माण मजदूरों के हुनर को बढ़ाने के लिए CSIR-CBRI ने एक खास ट्रेनिंग प्रोग्राम कराने की योजना बनाई है. इस ट्रेनिंग का मुख्य उद्देश्य स्थानीय मजदूरों को सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीकों से मकान बनाना सिखाना है, साथ ही उन्हें निर्माण के नए और आधुनिक तौर-तरीकों का व्यावहारिक अनुभव देना है

यह कोशिश CSIR स्मार्ट विलेज मिशन के असली मकसद "लैब से जमीन तक" को सच करने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है. वैज्ञानिक और तकनीकी तौर-तरीकों की मदद से बाढ़ पीड़ित लोगों के घरों को सुरक्षित बनाने, बिजली-पानी की बचत करने, स्थानीय लोगों का हुनर बढ़ाने और भविष्य की आपदाओं से निपटने की उनकी क्षमता को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है. साथ ही, यह पूरा प्रयास साल 2047 तक भारत को एक पूरी तरह विकसित देश बनाने के बड़े लक्ष्य की ओर भी एक महत्वपूर्ण कदम है