देश में आरक्षण पर ऐसा संग्राम छिड़ा है कि अब इसकी तपिश सिर्फ सड़कों तक नहीं, बल्कि सियासी दलों के अंदर तक पहुंच गई है! जिस आरक्षण के मुद्दे पर अब तक ब्राह्मण,…
देश में आरक्षण पर ऐसा संग्राम छिड़ा है कि अब इसकी तपिश सिर्फ सड़कों तक नहीं, बल्कि सियासी दलों के अंदर तक पहुंच गई है! जिस आरक्षण के मुद्दे पर अब तक ब्राह्मण, ठाकुर और सामान्य वर्ग के लोग सरकार के सामने हुंकार भर रहे थे, अब उसी मुद्दे पर दलित राजनीति भी दो खेमों में बंटी नजर आ रही है।
आरक्षण में बदलाव को लेकर भिड़ गये मोदी, शाह के दो दलित नेता! मचा भयंकर बवाल! इस्तीफे का हो गया ऐलान!
एक तरफ आरक्षण में किसी भी तरह के बदलाव के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं, तो दूसरी तरफ दलित और पिछड़े समाज के ही कई बड़े नेता आरक्षण में वर्गीकरण और बदलाव की खुलकर मांग कर रहे हैं। महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में दलित संगठनों के सड़क पर उतरने के बाद अब बिहार और उत्तर प्रदेश की सियासत में भी इसकी गूंज सुनाई देने लगी है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चिराग पासवान, मायावती, चंद्रशेखर आजाद और अखिलेश यादव जैसे नेताओं के बयानों को आरक्षण व्यवस्था में बदलाव के विरोध के संदर्भ में देखा जा रहा है, तो दूसरी तरफ जीतन राम मांझी, ओम प्रकाश राजभर, संजय निषाद और रोहिणी घावरी जैसे चेहरे आरक्षण के भीतर ही उन जातियों तक लाभ पहुंचाने की बात कर रहे हैं, जिन्हें अब तक इसका पर्याप्त फायदा नहीं मिला। दलील सीधी है—आरक्षण खत्म नहीं होना चाहिए, लेकिन इसका लाभ उन्हीं तक क्यों सीमित रहे जो पीढ़ियों से इसका फायदा उठा रहे हैं? दावा किया जा रहा है कि दलित और ओबीसी समाज की कई जातियां आज भी आरक्षण के लाभ से काफी हद तक दूर हैं। वहीं सामान्य वर्ग के आंदोलनकारी भी आरक्षण खत्म करने के बजाय इसके लाभ को जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक पहुंचाने की मांग कर रहे हैं। और अब इस मुद्दे ने बिहार में नया सियासी विस्फोट कर दिया है। जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच आरक्षण को लेकर बयानबाजी इतनी तेज हो गई है कि एक-दूसरे के इस्तीफे तक की मांग सामने आ रही है। यानी सवाल सिर्फ आरक्षण का नहीं, बल्कि दलित वोट बैंक के भीतर नेतृत्व और हिस्सेदारी की लड़ाई का भी बनता जा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल—क्या 2027 के चुनाव से पहले आरक्षण पर सरकार कोई बड़ा फैसला लेगी? क्या आरक्षण में वर्गीकरण का रास्ता खुलेगा? और अगर सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया तो क्या इसका सियासी नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ सकता है? क्योंकि मामला अब सिर्फ आंदोलन का नहीं रहा… आरक्षण की यह आग धीरे-धीरे सियासत की सबसे बड़ी लड़ाई बनती जा रही है!





