4…

4 उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां चुनावी मुकाबला हजारों वोटों से नहीं, बल्कि महज कुछ सैकड़ों या एक-दो हजार वोटों से तय होता है। सिद्धार्थनगर की इटवा विधानसभा सीट भी ऐसी ही हाई-वोल्टेज सीट है। यहां पिछले दो चुनावों के नतीजे बताते हैं कि मुकाबला कितना करीबी हो सकता है। 2017 में बीजेपी ने करीब 10 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी, जबकि 2022 में समाजवादी पार्टी ने महज 1,662 वोटों के अंतर से सीट अपने नाम कर ली।यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इटवा का सियासी गणित चर्चा में है। सवाल सिर्फ बीजेपी और सपा की सीधी टक्कर का नहीं है, बल्कि मुस्लिम, ब्राह्मण, दलित और विभिन्न OBC समूहों के बीच वोटों का बंटवारा किस तरह होता है, यह भी बेहद अहम हो सकता है।

2017 में बीजेपी के डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी ने 59,524 वोट हासिल कर इटवा सीट पर जीत दर्ज की थी। BSP के अरशद खुर्शीद को 49,316 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय 46,601 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। बीजेपी की जीत का अंतर 10,208 वोट था।इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था त्रिकोणीय मुकाबला। BSP का मजबूत प्रदर्शन सपा के वोटों पर भी असर डालता दिखाई दिया और बीजेपी उम्मीदवार को इसका चुनावी फायदा मिला।

2022 में इटवा की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। इस बार माता प्रसाद पांडेय ने 64,253 वोट हासिल किए और बीजेपी के सतीश चंद्र द्विवेदी को 62,591 वोट मिले। अंतर सिर्फ 1,662 वोट रहा। BSP के हरि शंकर सिंह को भी 24,944 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार अरशद खुर्शीद को 10,326 वोट मिले।

यानी BSP का वोट बैंक यहां आज भी चुनावी गणित में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर मुकाबला दो ध्रुवीय होता है तो ये वोट किस दिशा में जाते हैं, यह समीकरण को प्रभावित कर सकता है।

इटवा सामान्य सीट है। यहां मुस्लिम मतदाताओं की मौजूदगी के साथ ब्राह्मण मतदाता भी महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह माने जाते हैं। इसके अलावा अनुसूचित जाति और विभिन्न OBC समुदाय चुनावी समीकरण में अपनी भूमिका निभाते हैं। हालांकि उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों में विधानसभा क्षेत्रवार जातिगत मतदाता संख्या प्रकाशित नहीं होती, इसलिए किसी समुदाय की सटीक संख्या के आधार पर निष्कर्ष निकालना सावधानी मांगता है।बीजेपी के लिए चुनौती अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच समर्थन को बनाए रखने की होगी, जबकि सपा के सामने 2022 की बढ़त को दोहराने और अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत रखने की चुनौती होगी।

इटवा डुमरियागंज लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में यहां भी मुकाबला करीबी रहा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी के जगदंबिका पाल और सपा के भीष्म शंकर के बीच वोटों का अंतर करीब 2,456 रहा। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे, उम्मीदवार और मतदान व्यवहार अलग हो सकते हैं, इसलिए इसे सीधे 2027 का संकेत मानना उचित नहीं होगा।

इटवा में 2027 की चुनावी बहस सिर्फ जातीय समीकरण तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। सड़क, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन, कृषि और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे स्थानीय मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।बीजेपी के सामने 2017 की जीत वाले समीकरण को नए राजनीतिक माहौल में दोहराने की चुनौती होगी। सपा के लिए 2022 की जीत को मजबूत बहुमत में बदलने की चुनौती होगी। वहीं BSP अगर अपना प्रभाव बनाए रखती है, तो उसका वोट शेयर मुकाबले की दिशा बदलने वाला फैक्टर बन सकता है।इटवा का इतिहास फिलहाल एक बात साफ करता है—यहां चुनावी बाजी आखिरी दौर तक खुली रह सकती है। 2022 में सिर्फ 1,662 वोटों ने तस्वीर बदल दी थी। अब 2027 में सवाल यही है कि क्या बीजेपी वापसी का रास्ता बना पाएगी, क्या सपा अपना किला बचाएगी, या फिर BSP का वोट एक बार फिर पूरे सियासी गणित को उलट देगा?

रश्मि सिंह एक अनुभवी पत्रकार और डिजिटल कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता, न्यूज़ रिपोर्टिंग और डिजिटल मीडिया का व्यापक अनुभव है। उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है और अपने पत्रकारिता करियर में कई बड़े मीडिया संस्थानों और न्यूज़ चैनलों के साथ काम किया है।राजनीति, जनसरोकार, उत्तर प्रदेश की सियासत और समसामयिक मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ है। खबरों को सरल, तथ्यपरक और पाठकों के लिए रोचक अंदाज में प्रस्तुत करना उनकी लेखन शैली की खासियत है। डिजिटल पत्रकारिता के बदलते दौर में रश्मि सिंह का प्रयास है कि पाठकों तक तेज, विश्वसनीय और आसान भाषा में तथ्य आधारित खबरें पहुंचें।

Forgot your password? Get help