उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद की 10 सीटों का चुनाव एक अहम राजनीतिक मुकाबला बनने जा रहा है, इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 30…
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद की 10 सीटों का चुनाव एक अहम राजनीतिक मुकाबला बनने जा रहा है, इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 30 जनवरी 2027 को समाप्त होना है, चुनाव विधायकों के वोट से होगा, इसलिए राजनीतिक दलों की नजर अपने संख्या बल के साथ-साथ सहयोगी दलों और विधायकों के मतदान व्यवहार पर भी रहेगी।
कार्यकाल पूरा होने वाली 10 सीटों में 9 फिलहाल बीजेपी और एक समाजवादी पार्टी के पास बताई जा रही है, बीजेपी के कुंवर मानवेंद्र सिंह, धर्मेंद्र सिंह, स्वतंत्र देव सिंह, अरविंद कुमार शर्मा, अश्विनी त्यागी, गोविंद नारायण शुक्ला, धर्मवीर प्रजापति, सलिल विश्नोई और सुरेंद्र चौधरी का कार्यकाल समाप्त होगा, वहीं सपा के राजेंद्र चौधरी भी कार्यकाल पूरा करने वाले सदस्यों में शामिल हैं, इन सीटों के चुनाव में विधानसभा के मौजूदा संख्या बल की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, हालिया रिपोर्टिंग में इसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलों के लिए एक अहम राजनीतिक परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।
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विधायकों द्वारा होने वाले विधान परिषद चुनाव में जीत के लिए उम्मीदवार को निर्धारित कोटा हासिल करना होता है, दिए गए मौजूदा विधानसभा आंकड़ों के आधार पर एक सीट के लिए 37 वोट का आंकड़ा सामने आ रहा है, हालांकि अंतिम गणना चुनाव के समय मौजूद वैध मतों और आधिकारिक चुनावी प्रक्रिया के अनुसार होगी, यही संख्या सीटों के संभावित बंटवारे का आधार बनती है, ऐसे में किसी दल के पास पहली पसंद के वोटों के बाद बचने वाले मत भी अतिरिक्त सीट के समीकरण में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
दिए गए राजनीतिक आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी के पास 255 विधायक बताए जा रहे हैं, सहयोगी दलों और कुछ अन्य विधायकों के समर्थन को जोड़ने पर सत्तापक्ष का संख्या बल और बढ़ता है, इसी आधार पर बीजेपी के लिए मौजूदा 10 सीटों में अतिरिक्त सीट हासिल करने की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज है, हालांकि किसी सीट पर जीत को पहले से तय मानना मतदान से पहले संभव नहीं है, उम्मीदवारों की संख्या, गठबंधन का समर्थन और मतदान के समय विधायकों का वास्तविक रुख अंतिम समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
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वहीं समाजवादी पार्टी के पास 101 विधायक बताए गए हैं, 37 वोट के हिसाब से 74 वोट दो सीटों के लिए पर्याप्त माने जा रहे हैं, इसके बाद बचने वाले वोट तीसरी सीट के लिए गणित का हिस्सा बनते हैं, कांग्रेस के दो विधायकों का समर्थन मिलने पर सपा के पास अतिरिक्त वोटों की संख्या बढ़ सकती है, इसके अलावा कुछ अन्य विधायकों के रुख को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं चल रही हैं।
इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह हो सकती है कि पार्टियों के घोषित संख्या बल और मतदान के दौरान सामने आने वाले वास्तविक वोटों में कितना अंतर रहता है, कुछ विधायकों के पिछले मतदान और मौजूदा राजनीतिक रुख को लेकर पहले से चर्चा है, ऐसे में यदि अतिरिक्त उम्मीदवार मैदान में आते हैं तो पहली और दूसरी वरीयता के वोटों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
विधान परिषद का यह चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हैं, इसलिए बीजेपी और सपा के लिए यह चुनाव सिर्फ परिषद की सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे दोनों दलों के मौजूदा गठबंधन और विधानसभा के भीतर समर्थन के समीकरण भी सामने आ सकते हैं, फिलहाल तस्वीर संख्या बल, सहयोगी समर्थन और उम्मीदवारों पर निर्भर है, अंतिम नतीजा मतदान के बाद ही साफ होगा, लेकिन 2027 से पहले होने वाला यह चुनाव यूपी की सियासत में विधायकों के रुख और दलों के संगठनात्मक समीकरणों पर नजर रखने का एक अहम मौका जरूर होगा।
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