SIR Controversy Explainer: देश में मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर बहस अब सिर्फ राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रही ह…

SIR Controversy Explainer: देश में मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर बहस अब सिर्फ राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रही है. सितंबर 2026 में सामने आई एक रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर ही SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर मतभेद की चर्चा तेज कर दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले करीब 10 महीनों में कई मौकों पर आयोग के फैसलों और प्रक्रिया को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं. वहीं चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि चर्चा के दौरान सवाल और टिप्पणियां होना सामान्य है, लेकिन किसी आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक असहमति दर्ज नहीं की

ऐसे में सवाल है कि आखिर एसआईआर क्या है विवाद की शुरुआत कहां से हुई, चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद किन मुद्दों पर है, विपक्ष क्या आरोप लगा रहा है और चुनाव आयोग के साथ केंद्र सरकार का इस पूरे मामले पर क्या कहना है

सबसे पहले तो यह समझ लें कि आखिर SIR है क्या है. दरअसल यह मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा की प्रक्रिया है. इसका मकसद मतदाता सूची को अपडेट करना, मृत या स्थान बदल चुके लोगों के नामों की पहचान करना, डुप्लीकेट एंट्री को हटाना और पात्र नागरिकों को सूची में शामिल करना है

चुनाव आयोग के मुताबिक, इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई पात्र नागरिक मतदाता सूची से बाहर न रहे और कोई अपात्र व्यक्ति उसमें शामिल न हो. मई 2026 में जारी सरकारी जानकारी के मुताबिक आयोग ने 16 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर का आदेश दिया था

SIR की मौजूदा प्रक्रिया की शुरुआत बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले हुई थी और इसके बाद इसे दूसरे राज्यों में भी लागू किया गया

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR की संवैधानिक और कानूनी वैधता को बरकरार रखा. अदालत ने माना कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए SIR करने का अधिकार है. हालांकि अदालत ने प्रक्रिया के दौरान नागरिकों को उचित अवसर और सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया

विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू अब चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद है. द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज की. रिपोर्ट में दावा किया गया कि इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने, मतदाता डेटा तक पहुंच और SIR से जुड़े तकनीकी प्रबंधन जैसे मुद्दों से था

रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में इस बात पर सवाल उठाया कि महत्वपूर्ण फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना कैसे लिए गए. एक अन्य चिंता मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच और उसके कथित केंद्रीकरण को लेकर बताई गई

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है यह रिपोर्ट में सामने आई आपत्तियां हैं, न कि चुनाव आयोग की ओर से स्वीकार किया गया औपचारिक संस्थागत विभाजन

SIR विवाद का एक हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े Form-6 में बदलाव को लेकर है. रिपोर्ट के अनुसार, Form-6 में ऐसा सवाल जोड़ा गया था जिसमें नए मतदाता या उसके माता-पिता/दादा-दादी के पुराने SIR की मतदाता सूची में मौजूद होने के बारे में जानकारी मांगी गई. रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव की प्रक्रिया और कानूनी आधार को लेकर आपत्ति जताई थी

यही मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नया मतदाता बनने की प्रक्रिया सीधे नागरिक के मताधिकार से जुड़ी है. ऐसे में विपक्ष और आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि किसी व्यक्ति के पास पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं तो क्या वह अनावश्यक रूप से कठिन प्रक्रिया में फंस सकता है

दूसरा बड़ा मुद्दा वोटर डेटा और IT सिस्टम से संबंधित है. रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई. उनका सवाल था कि स्थानीय स्तर पर कानूनन जिम्मेदार अधिकारियों की डेटाबेस तक पर्याप्त और स्वतंत्र पहुंच बनी रहनी चाहिए

यह मुद्दा इसलिए संवेदनशील है क्योंकि मतदाता सूची तैयार करने, उसमें नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारियां निर्धारित होती हैं. अगर तकनीकी सिस्टम और प्रशासनिक अधिकारों के बीच तालमेल में कमी आती है, तो किसी पात्र मतदाता का नाम प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है

विपक्षी दलों ने SIR को लेकर मुख्य रूप से मतदाता अधिकार, पारदर्शिता और संभावित नाम कटने के मुद्दे उठाए हैं.उनका तर्क है कि बड़े पैमाने पर दस्तावेज या पुराने रिकॉर्ड मांगने से गरीब, प्रवासी, बुजुर्ग और ऐसे नागरिक प्रभावित हो सकते हैं जिनके पास पुराने दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं

विपक्ष के कई नेताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि SIR की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में मतदाता सूची को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है

हालिया रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर सामने आई आपत्तियों के बाद विपक्षी नेताओं ने आयोग की कार्यप्रणाली पर और सवाल उठाए हैं. हालांकि इन राजनीतिक आरोपों को स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के तौर पर नहीं देखा जा सकता; ये संबंधित दलों और नेताओं के दावे हैं

चुनाव आयोग की ओर से सामने आई सफाई में कहा गया है कि चर्चा के दौरान सवाल उठाना और औपचारिक असहमति अलग-अलग चीजें हैं

आयोग के सूत्रों के मुताबिक, SIR समेत विभिन्न विषयों पर आयुक्तों के बीच सवाल, टिप्पणियां और स्पष्टीकरण सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं. आयोग ने यह भी कहा कि जिन संबंधित आदेशों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उन पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं और किसी आयुक्त ने अंतिम निर्णय के खिलाफ औपचारिक dissent दर्ज नहीं किया

कानून के मुताबिक, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में CEC और दोनों चुनाव आयुक्त समान दर्जे के सदस्य होते हैं. यदि किसी मुद्दे पर राय अलग हो तो कानून में बहुमत के आधार पर फैसला लेने का प्रावधान है

इसलिए मौजूदा विवाद में एक तरफ रिकॉर्ड पर दर्ज आपत्तियों की रिपोर्ट है, जबकि दूसरी तरफ आयोग की यह स्थिति है कि इन्हें औपचारिक असहमति या निर्णय प्रक्रिया के टूटने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए

विवाद के बीच दिल्ली में SIR की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियां भी महत्वपूर्ण हैं. 22 सितंबर 2026 को अदालत ने कुछ मतदाताओं को जारी नोटिसों के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया कुछ नोटिस 'मशीनी' तरीके से जारी किए गए प्रतीत होते हैं. अदालत ने आयोग से यह भी विचार करने को कहा कि प्रक्रिया में अतिरिक्त फिल्टर की जरूरत है या नहीं

इससे साफ है कि अदालत SIR के मूल अधिकार पर नहीं, बल्कि उसके कार्यान्वयन, नोटिस प्रक्रिया और मतदाताओं को उचित अवसर मिलने जैसे पहलुओं पर भी नजर रख रही है

केंद्र सरकार लगातार SIR को मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया के रूप में देखती रही है. दिसंबर 2025 में लोकसभा में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि SIR की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है और आयोग सरकार के अधीन काम नहीं करता. उन्होंने इसे संविधान के तहत चुनाव आयोग की जिम्मेदारी से जोड़ा और कहा कि मतदाता सूची में मृत, डुप्लीकेट या अपात्र प्रविष्टियों की पहचान जरूरी है

सरकार का तर्क है कि लोकतांत्रिक चुनाव के लिए मतदाता सूची की शुद्धता बुनियादी आवश्यकता है. कानून मंत्रालय ने भी जुलाई 2026 में कहा था कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को सटीक और अपडेट रखना तथा अपात्र या डुप्लीकेट नामों को हटाना है, साथ ही पात्र मतदाताओं को बाहर होने से बचाने के लिए कई सुरक्षा उपाय मौजूद हैं

सुप्रीम कोर्ट का मई 2026 का फैसला भी सरकार और आयोग के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार देता है, क्योंकि अदालत ने SIR करने के चुनाव आयोग के अधिकार को स्वीकार किया था

पूरे विवाद को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है

पहला, क्या मतदाता सूची को नियमित रूप से साफ और अपडेट करना जरूरी है? इस उद्देश्य पर व्यापक तौर पर विवाद नहीं है

दूसरा, यह प्रक्रिया किस तरीके से लागू होनी चाहिए? यहीं दस्तावेज, पुराने रिकॉर्ड, नोटिस, अपील और तकनीकी सिस्टम जैसे सवाल सामने आते हैं

तीसरा, चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? मौजूदा विवाद में दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट ने इसी सवाल को केंद्र में ला दिया है, जबकि आयोग का कहना है कि औपचारिक असहमति दर्ज नहीं हुई और अंतिम आदेशों पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं

इसलिए SIR विवाद को केवल राजनीतिक आरोप बनाम आयोग की सफाई के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं देता. एक तरफ मतदाता सूची की शुद्धता और पात्र-अयोग्य मतदाताओं की पहचान का संवैधानिक प्रश्न है, तो दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी पात्र नागरिक का वोट केवल प्रशासनिक, तकनीकी या दस्तावेजी समस्या के कारण प्रभावित न हो. मौजूदा घटनाक्रम में चुनाव आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड, न्यायिक निगरानी और SIR की आगे की प्रक्रिया तीनों इस बहस की दिशा तय करने वाले प्रमुख पहलू बने हुए हैं