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SC-ST एक्ट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! मारपीट का केस रहेगा जारी, लेकिन एक्ट की कार्रवाई रद्द -

🕐 31 Oct 2026, 06:00 pm• 5 min padho • Chugal Khor News
SC-ST एक्ट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! मारपीट का केस रहेगा जारी, लेकिन एक्ट की कार्रवाई रद्द -

उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही रद्द कर दी, जबकि मारपीट के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई जारी रहने का रास्ता खुला रखा। अदालत के फैसले ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि किन परिस्थितियों में जातिसूचक अपमान एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध बनता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से क्यों हो रही चर्चा?

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न और अपमान से सुरक्षा देने वाले एससी-एसटी एक्ट को लेकर कानूनी बहस के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले की चर्चा हो रही है। फिरोजाबाद जिले के टूंडला थाने से जुड़े मामले में अदालत ने एससी-एसटी एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को निरस्त कर दिया। हालांकि, मारपीट के आरोपों को लेकर कार्रवाई जारी रहने का रास्ता खुला रखा गया। इस फैसले का मुख्य पहलू यह है कि अदालत ने मामले में उपलब्ध आरोपों और अभियोजन सामग्री के आधार पर विचार किया कि क्या एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध के आवश्यक कानूनी तत्व सामने आते हैं।

फिरोजाबाद के भूरी सिंह और प्रशांत कुमार से जुड़ा क्या है मामला?

मामला उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले का है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, भूरी सिंह के खिलाफ मारपीट और जातिसूचक अपशब्द कहने के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया था। आरोप था कि प्रशांत कुमार पर हमला किया गया और शिकायतकर्ता के खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां आरोपी पक्ष की ओर से एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज आरोपों को चुनौती दी गई। बचाव पक्ष ने पुरानी रंजिश के कारण फंसाए जाने और शुरुआती बयानों में जातिसूचक गालियों का उल्लेख नहीं होने जैसे तर्क दिए। वहीं, सरकारी पक्ष ने इन दलीलों को विवादित तथ्यों से जुड़ा बताया।

अदालत ने एससी-एसटी एक्ट पर क्या कहा?

मामले में न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ के फैसले का उल्लेख किया जा रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, अदालत ने माना कि हर अपमान, गाली या धमकी अपने आप में एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बन जाती। इस कानून के तहत अपराध स्थापित करने के लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों के आवश्यक तत्वों का पूरा होना जरूरी है। मामले की परिस्थितियों और आरोपों से यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित अपराध की कानूनी शर्तें पूरी होती हैं। अदालत के सामने उपलब्ध सामग्री में कथित जातिसूचक अपशब्दों और अनुसूचित जाति से संबंधित पहचान के आधार पर अपमान किए जाने की मंशा को स्थापित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिला। इसी आधार पर एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही रद्द की गई।

मारपीट के आरोपों पर जारी रह सकती है कार्रवाई

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही निरस्त होने का अर्थ यह नहीं है कि मारपीट के आरोप भी स्वतः समाप्त हो गए।उपलब्ध विवरण के मुताबिक, प्रशांत कुमार के बाएं कान पर किसी कठोर वस्तु से हमला किए जाने के आरोप के संबंध में आपराधिक कार्यवाही जारी रहने का रास्ता खुला रखा गया। इससे स्पष्ट होता है कि किसी मामले में एक विशेष कानून के तहत आरोपों का टिकना और अन्य आपराधिक आरोपों का बने रहना अलग-अलग कानूनी प्रश्न हो सकते हैं।

क्या अब एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराना मुश्किल होगा?

इस फैसले के बाद एक अहम सवाल उठता है कि क्या इससे एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। कानूनी दृष्टि से इस फैसले को यह नहीं माना जा सकता कि एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराना अब मुश्किल हो जाएगा या इस कानून का दुरुपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ स्वतः कार्रवाई होगी। अदालतों को हर मामले में उसके विशिष्ट तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय लेना होता है। यदि किसी मामले में अपराध के आवश्यक तत्व सामने नहीं आते, तो अदालत कानून के अनुसार उचित राहत दे सकती है। दूसरी ओर, जातिगत उत्पीड़न के वास्तविक मामलों में पीड़ितों को कानूनी संरक्षण और न्याय दिलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

एससी-एसटी एक्ट का उद्देश्य और कानूनी प्रक्रिया

एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को जाति आधारित अत्याचारों से सुरक्षा देना है। इस कानून के तहत अपराध निर्धारित करने के लिए संबंधित धारा की शर्तों का पूरा होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक रूप से जातिसूचक अपमान से संबंधित प्रावधानों में पीड़ित की सामाजिक पहचान, कथित कृत्य की प्रकृति और कानून में निर्धारित अन्य आवश्यक परिस्थितियों पर विचार किया जाता है। इसलिए किसी भी मामले में केवल विवाद या अपमान का आरोप सामने आना पर्याप्त नहीं है; यह देखना भी जरूरी है कि आरोपित कृत्य संबंधित कानूनी प्रावधान के दायरे में आता है या नहीं।

क्या इस फैसले से राजनीतिक बहस तेज होगी?

एससी-एसटी एक्ट को लेकर देश में समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है। कुछ लोग इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर देते हैं, जबकि कुछ मामलों में कानून के दुरुपयोग की आशंकाओं को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को भी इसी व्यापक बहस के संदर्भ में देखा जा सकता है। हालांकि, किसी एक मामले के फैसले के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि कानून का व्यापक दुरुपयोग हो रहा है या इससे किसी पूरे सामाजिक वर्ग के अधिकार प्रभावित होंगे। अदालत के फैसले का मूल संदेश यही है कि कानून के तहत आरोपों की जांच और न्यायिक समीक्षा निर्धारित कानूनी मानकों के आधार पर होनी चाहिए। इससे वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने और आरोपित व्यक्तियों के कानूनी अधिकारों की रक्षा, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।

स्रोत: Filmitics

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