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पूर्वांचल के ‘एंबुलेंस मैन’ डॉ. शिशिर: मरीज नहीं, मरीज तक पहुंचता है पूरा अस्पताल

🕐 11 Aug 2026, 12:51 pm• 6 min padho • Chugal Khor News
पूर्वांचल के ‘एंबुलेंस मैन’ डॉ. शिशिर: मरीज नहीं, मरीज तक पहुंचता है पूरा अस्पताल

आजमगढ़ के ‘एंबुलेंस मैन’ की अनोखी पहल, रास्ते में जरूरतमंदों को मिलती है जिंदगी की उम्मीद

पायनियर समाचार सेवा आजमगढ़। पूर्वांचल की सड़कों पर जब भी कोई सायरन बजाती एंबुलेंस तेजी से गुजरती है, तो लोगों के मन में यही खयाल आता है कि किसी मरीज की जान खतरे में होगी और उसे तुरंत अस्पताल ले जाया जा रहा होगा। लेकिन, आजमगढ़ और इसके आस-पास के जिलों में दौड़ने वाली एक एंबुलेंस की कहानी जरा अलग है। इस एंबुलेंस में कोई मरीज अस्पताल नहीं जा रहा होता, बल्कि पूरा का पूरा ‘अस्पताल’ ही मरीज के दरवाजे तक पहुंच रहा होता है

इस एंबुलेंस में सफर करते हैं उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ स्थित वेदांता हॉस्पिटल के संस्थापक, डॉ. शिशिर जायसवाल। पूर्वांचल में ‘एंबुलेंस मैन’ के नाम से विख्यात डॉ. शिशिर को जब आजमगढ़ से बाहर—गोरखपुर, मऊ, गाजीपुर या वाराणसी जाना होता है, तो उनका वाहन कोई लग्जरी कार नहीं बल्कि एंबुलेंस ही होती है। इसका मकसद सीधा और स्पष्ट है: जीवन रक्षक उपकरणों से लैस होकर हर उस रास्ते से गुजरना, जहां किसी भी वक्त, किसी भी जरूरतमंद को आपातकालीन चिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है

द एंबुलेंस मैन: सड़क पर दौड़ती संजीवनी ——————— भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की सबसे बड़ी चुनौती ‘गोल्डन आवर’ (इमरजेंसी के बाद का वह पहला घंटा जिसमें जान बचने की संभावना सबसे अधिक होती है) में इलाज का न मिल पाना है। डॉ. शिशिर ने इस समस्या का एक व्यावहारिक समाधान निकाला। उनकी एंबुलेंस सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता मिनी आईसीयू है। अपनी एंबुलेंस यात्राओं के दौरान डॉ. शिशिर अब तक हजारों किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं। रास्ते में कहीं भी कोई सड़क दुर्घटना हो, किसी को अचानक दिल का दौरा पड़ा हो या कोई अन्य मेडिकल इमरजेंसी हो, डॉ. शिशिर का यह चलता-फिरता अस्पताल तुरंत वहां रुकता है। बिना किसी स्वार्थ के, वह मरीजों को प्राथमिक उपचार और जीवन रक्षक सपोर्ट देते हैं। उनके इस अनोखे और मानवीय प्रयास ने अब तक सैकड़ों लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाला है

‘मिसाइल मैन’ की सीख बन गई मिशन

दुनिया के महानतम विचारकों में से एक, अल्बर्ट श्वाइट्जर ने कहा था, सफलता खुशी की चाबी नहीं है, बल्कि खुशी सफलता की चाबी है। आप जो कर रहे हैं अगर उससे प्यार करते हैं, तो आप जरूर सफल होंगे। डॉ. शिशिर के काम में यह खुशी और जुनून साफ झलकती है। लेकिन इस जुनून को एक स्पष्ट दिशा देने का काम भारत के पूर्व राष्ट्रपति और ‘मिसाइल मैन’ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने किया था

ये बात साल 2012 की है। डॉ. कलाम आजमगढ़ में डॉ. शिशिर के वेदांता अस्पताल का उद्घाटन करने आ रहे थे। उनके लिए वाराणसी से आजमगढ़ तक हेलिकॉप्टर की व्यवस्था की गई थी। लेकिन, जमीन से जुड़े डॉ. कलाम ने हेलिकॉप्टर के बजाय सड़क मार्ग से यात्रा करना चुना ताकि वह इलाके की स्थिति को करीब से समझ सकें। यात्रा के दौरान उनके काफिले की एक कार पंचर हो गई। डॉ. कलाम बड़ी शांति से कार से उतरे और सड़क किनारे बनी एक छोटी सी चाय की दुकान पर जाकर बैठ गए। वहां उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों से पूछा, “इन इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर आपकी सबसे बड़ी समस्या क्या है?” ग्रामीणों ने कहा, “साहब, अस्पताल बहुत दूर हैं। गांव से शहर पहुंचने में इतना समय लग जाता है कि कई बार रास्ते में ही मरीज दम तोड़ देता है।”

डॉ. कलाम वहां से निकलकर जब कार में बैठे तो रास्ते में उन्होंने डॉ शिशिर से कहा, “अगर मरीज अस्पताल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, तो क्यों न अस्पताल को ही मरीजों तक पहुंचाया जाए? तुम्हें एंबुलेंस के जरिए मरीजों तक तुरंत पहुंचने का तंत्र विकसित करना चाहिए।” उसी दिन से डॉ. शिशिर ने ठान लिया कि उनकी यात्राओं का माध्यम अब कोई सामान्य कार नहीं, बल्कि एक एंबुलेंस होगी

मां की ममता और एक एएनएम का सपना —————————— डॉ. कलाम के शब्दों ने डॉ. शिशिर के मन पर इतना गहरा प्रभाव इसलिए भी डाला, क्योंकि यह विचार उनके अंतर्मन में बचपन से ही मौजूद था। इस विचार का बीज बोया था उनकी मां ने। डॉ. शिशिर की मां एक एएनएम (ANM) वर्कर थीं। उनका काम गांव-गांव जाकर लोगों को दवाइयां देना और बच्चों को टीके लगाना था। वह अक्सर धूल भरी पगडंडियों से गुजरते हुए देखती थीं कि कैसे समय पर इलाज न मिलने के कारण लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं

बचपन में वह डॉ. शिशिर से अक्सर कहती थीं, “मैं रोज देखती हूं कि गांवों में जरूरतमंद लोग अस्पताल की चौखट तक नहीं पहुंच पाते। तुम जब बड़े होकर डॉक्टर बनना, तो कुछ ऐसा करना कि तुम्हारा अस्पताल उन तक पहुंचे। इलाज के अभाव में कोई गरीब दम न तोड़े।”

डॉ. कलाम की वैज्ञानिक दृष्टि और मां की ममतामयी कामना, दोनों ने मिलकर डॉ. शिशिर के भीतर उस ‘एंबुलेंस मैन’ को जन्म दिया, जो आज पूर्वांचल की सड़कों पर एक फरिश्ते की तरह दौड़ता है

जब देवदूत बनकर पहुंची एंबुलेंस ——————————-

डॉ. शिशिर जायसवाल की यह एंबुलेंस यात्रा के जीवन रक्षक बनने के कई किस्से हैं है। आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर और गोरखपुर के ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में ऐसे कई वाकये हुए हैं, जब डॉ. शिशिर का यह चलता-फिरता अस्पताल लोगों के लिए साक्षात संजीवनी साबित हुआ

गाजीपुर हाइवे पर एक दोपहर, मोटरसाइकिल सवार एक 22 वर्षीय युवक एक ट्रक की चपेट में आ गया। ज्यादा खून बह जाने के कारण उसकी नब्ज डूब रही थी। उसी वक्त वाराणसी की ओर जा रहे डॉ. शिशिर की एंबुलेंस वहां से गुजरी। उस युवक को हाइपोवोलेमिक शॉक (खून की कमी से होने वाला शॉक) लग चुका था। एंबुलेंस में मौजूद मेडिकल टीम ने वहीं सड़क पर ही युवक को ऑक्सीजन सपोर्ट दिया, आईवी फ्लूइड (IV Fluid) चढ़ाया और ब्लीडिंग रोकने के लिए तुरंत टांके लगाए। जब तक उसे पास के बड़े अस्पताल में शिफ्ट किया गया, उसकी हालत स्थिर हो चुकी थी

बदलाव की एक नई सुबह ———————————— आजमगढ़ से वाराणसी, गोरखपुर या गाजीपुर का सफर करते हुए डॉ. शिशिर की एंबुलेंस न जाने कितने लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन चुकी है। उनका यह प्रयास साबित करता है कि चिकित्सा केवल चार दीवारी के भीतर बैठकर मरीज का इंतजार करने का नाम नहीं है; यह एक सेवा है, जिसे खुद चलकर मरीज के पास जाना चाहिए

महान समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “अगर गरीब शिक्षा तक नहीं पहुंच सकता, तो शिक्षा को गरीब तक पहुंचना चाहिए।” डॉ. शिशिर जायसवाल ने इसी फलसफे को चिकित्सा के क्षेत्र में साकार कर दिखाया है

जब एक आम डॉक्टर अपनी निजी सुख-सुविधाओं को त्याग कर, एक एंबुलेंस को अपना सारथी बना लेता है, तो वह केवल मरीजों का इलाज नहीं करता, बल्कि समाज में एक ऐसा विश्वास जगाता है कि इंसानियत आज भी जिंदा है। ‘एंबुलेंस मैन’ डॉ. शिशिर जायसवाल की यह यात्रा केवल मीलों का सफर नहीं है; यह जीवन बचाने, उम्मीदें जगाने और मां के उस सपने को पूरा करने की एक अनवरत यात्रा है, जिसमें हर किलोमीटर पर किसी की धड़कनें फिर से लौट आती हैं

स्रोत: The Hindi Pioneer

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