Pakeezah: Meena Kumari's classic film took 15 years to complete; find out why Kamal Amrohi's story remained unfinished.
हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्मों में शामिल ‘पाकीज़ा’ एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौटने जा रही है। निर्देशक कमाल अमरोही की इस यादगार फिल्म को नए 4K रेस्टोरेशन के साथ अक्टूबर 2026 में प्रतिष्ठित BFI लंदन फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया जाएगा। 18 अक्टूबर को सेंट्रल लंदन के BFI IMAX में होने वाली विशेष स्क्रीनिंग के टिकट पहले ही बिक चुके हैं। फिल्म की इस वापसी ने एक बार फिर मीना कुमारी और कमाल अमरोही की उस कहानी को चर्चा में ला दिया है, जिसके पूरा होने में करीब 15 साल लग गए थे।
‘पाकीज़ा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि जुनून, मोहब्बत, बिछड़ने और एक अधूरे सपने को पूरा करने की कहानी भी है। इसकी शूटिंग के दौरान तकनीकी बदलावों से लेकर निजी जिंदगी में आए उतार-चढ़ाव तक, कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने फिल्म को हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल कर दिया।
‘पाकीज़ा’ बनाने का सफर 17 जनवरी 1957 को शुरू हुआ था। कमाल अमरोही इस फिल्म को बड़े स्तर पर बनाना चाहते थे और उन्होंने इसकी कहानी मीना कुमारी को ध्यान में रखकर लिखी थी। उस समय मीना कुमारी हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शामिल थीं, जबकि कमाल अमरोही निर्देशक और पटकथा लेखक के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे।
दोनों की प्रेम कहानी भी फिल्मी दुनिया की चर्चित कहानियों में से एक रही है। कमाल अमरोही और मीना कुमारी ने 14 फरवरी 1952 को शादी की थी। दोनों ने इससे पहले फिल्म ‘दायरा’ में साथ काम किया था। हालांकि, फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन कमाल अमरोही ने मीना कुमारी के साथ एक ऐसी फिल्म बनाने का सपना देखा, जो उनकी पहचान का अहम हिस्सा बन जाए।
‘पाकीज़ा’ के निर्माण में देरी की एक बड़ी वजह कमाल अमरोही का तकनीकी गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना था। शुरुआत में फिल्म को ब्लैक एंड व्हाइट बनाने की योजना थी, लेकिन बाद में इसे रंगीन बनाने का फैसला लिया गया। इसके बाद कमाल अमरोही ने फिल्म को सिनेमास्कोप तकनीक में बनाने का निर्णय किया।
उस दौर में यह एक बड़ा तकनीकी प्रयोग था। इसके लिए लंदन के MGM स्टूडियो से सिनेमास्कोप लेंस किराए पर मंगवाए गए। इन लेंसों का किराया करीब 50 हजार रुपये प्रतिमाह बताया जाता है। तकनीक में बदलाव, महंगे उपकरण और कमाल अमरोही की बारीकियों पर विशेष नजर ने फिल्म के निर्माण को और लंबा कर दिया।
कमाल अमरोही अपनी फिल्मों में किसी भी तरह की कमी नहीं चाहते थे। ‘पाकीज़ा’ की शूटिंग के दौरान उन्हें कैमरे के लेंस के फोकस में मामूली गड़बड़ी का संदेह हुआ। कैमरामैन और दूसरी प्रयोगशालाओं की जांच में शुरुआत में फोकस सही पाया गया, लेकिन कमाल अमरोही संतुष्ट नहीं हुए।
बताया जाता है कि फुटेज को लंदन और फिर हॉलीवुड की प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा गया। आखिरकार बेहद मामूली तकनीकी अंतर सामने आने की बात कही जाती है। कमाल अमरोही की इसी बारीकी और परफेक्शन के प्रति जुनून ने फिल्म के निर्माण को खास बनाया।
‘पाकीज़ा’ के भव्य सेट भी इसकी चर्चा की बड़ी वजह रहे। फिल्म के ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ सेट को तैयार करने के लिए भारी मेहनत और खर्च किया गया। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, इस सेट को बनाने में 10 लाख रुपये से अधिक खर्च हुए थे।
चार मंजिला इस सेट को वास्तविक बाजार जैसा रूप देने के लिए सैकड़ों कारीगरों ने कई महीनों तक काम किया। अलग-अलग हिस्सों से दुकानें और बाजार से जुड़ी चीजें लाकर यहां सजाई गईं। फिल्म के मुजरा दृश्यों को भव्य बनाने के लिए भी विशेष तैयारियां की गईं।
फिल्म के ‘इन्हीं लोगों ने’, ‘ठाड़े रहियो’ और ‘चलते-चलते’ जैसे गीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं। इन गीतों में मीना कुमारी की अदाकारी और फिल्म का सौंदर्य ‘पाकीज़ा’ की पहचान बन गया।
एक तरफ फिल्म का निर्माण चल रहा था, तो दूसरी तरफ कमाल अमरोही और मीना कुमारी के निजी रिश्तों में तनाव बढ़ने लगा। मार्च 1964 में दोनों अलग हो गए। इस अलगाव का असर फिल्म के निर्माण पर भी पड़ा और ‘पाकीज़ा’ लंबे समय तक अधूरी रही।
इस दौर में मीना कुमारी की सेहत भी बिगड़ने लगी। उन्हें लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ा और इलाज के लिए विदेश भी जाना पड़ा। उनकी निजी जिंदगी की परेशानियों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने फिल्म को पूरा करने की राह और मुश्किल बना दी।
मीना कुमारी की जिंदगी और ‘पाकीज़ा’ के निर्माण से जुड़े इन घटनाक्रमों का जिक्र कई लेखकों और जीवनीकारों ने अपनी किताबों में किया है। यही वजह है कि फिल्म की कहानी को अक्सर पर्दे के पीछे की एक लंबी और भावनात्मक यात्रा के तौर पर याद किया जाता है।
‘पाकीज़ा’ को पूरा करने के लिए कमाल अमरोही ने मीना कुमारी से दोबारा साथ काम करने की अपील की थी। 25 अगस्त 1968 को लिखी गई एक चिट्ठी का उल्लेख मीना कुमारी की जीवनी में मिलता है। इसमें कमाल अमरोही ने फिल्म को पूरा करने की जरूरत पर जोर दिया था।
उनका मानना था कि फिल्म से कई लोगों की उम्मीदें और भविष्य जुड़े हुए हैं, इसलिए इसे अधूरा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यह चिट्ठी ‘पाकीज़ा’ को पूरा करने के उनके दृढ़ संकल्प और फिल्म से जुड़े लोगों की उम्मीदों को दर्शाती है।
लंबे इंतजार और तमाम मुश्किलों के बाद ‘पाकीज़ा’ साल 1972 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई। मीना कुमारी की अदाकारी, कमाल अमरोही का भव्य निर्देशन, शानदार संगीत और यादगार गीतों ने इसे हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में जगह दिलाई।
फिल्म की रिलीज के कुछ ही समय बाद, 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी का निधन हो गया। उनके जाने के बाद ‘पाकीज़ा’ को उनकी यादगार विरासत के रूप में भी देखा जाने लगा।
अब 4K रेस्टोरेशन के साथ फिल्म की अंतरराष्ट्रीय स्क्रीनिंग नई पीढ़ी के दर्शकों को इस क्लासिक को बड़े पर्दे पर देखने का अवसर देगी। 54 साल बाद भी ‘पाकीज़ा’ के प्रति दर्शकों की दिलचस्पी यह बताती है कि कुछ फिल्में अपने दौर से आगे निकलकर हमेशा के लिए सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं।



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