नेपाल में हालिया प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर हिमालयी राज्यों में रहने वाले लोगों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। भौगोलिक परिस्थितियों और हिमालयी क्षेत्र की सं…
नेपाल में हालिया प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर हिमालयी राज्यों में रहने वाले लोगों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। भौगोलिक परिस्थितियों और हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता के कारण उत्तराखंड को भी भूकंप, भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है।
उत्तराखंड और नेपाल दोनों ही सेंट्रल हिमालयन बेल्ट का हिस्सा हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय का यह क्षेत्र भूगर्भीय और जलवायु संबंधी बदलावों के कारण प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील है। ऐसे में नेपाल में हुई घटना ने उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की तैयारियों को लेकर चर्चा फिर तेज कर दी है।
उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति इसे कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। ऊंचे पर्वत, ग्लेशियर, खड़ी ढलानें और तेज बहाव वाली नदियां यहां जोखिम को बढ़ाती हैं। बीते वर्षों में राज्य कई बड़ी आपदाओं का सामना कर चुका है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की चमोली आपदा ने दिखाया कि ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं, भारी बारिश और अचानक पानी का बहाव कितनी बड़ी तबाही ला सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालयी क्षेत्रों में तापमान और मौसम के पैटर्न में बदलाव से ग्लेशियरों और पर्वतीय झीलों से जुड़े जोखिमों पर लगातार निगरानी की जरूरत बढ़ गई है।
नेपाल में आपदा की खबरों के बाद उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों, खासकर चंपावत और पिथौरागढ़, में निगरानी और सतर्कता बढ़ाई गई है। नदियों के जलस्तर और आसपास के संवेदनशील इलाकों पर नजर रखने के लिए आपदा प्रबंधन तंत्र को सक्रिय रखा जाता है। राज्य आपदा प्रतिवादन बल यानी SDRF और अन्य एजेंसियां संभावित बाढ़, भूस्खलन और अचानक बढ़ते जलस्तर जैसी स्थितियों से निपटने के लिए तैयार रहती हैं।
उत्तराखंड में संवेदनशील झीलों, ग्लेशियरों और नदी क्षेत्रों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। कई स्थानों पर सेंसर और स्वचालित मौसम स्टेशन लगाए जा रहे हैं, ताकि मौसम और जलस्तर में अचानक होने वाले बदलाव का पता लगाया जा सके। ऐसे सिस्टम का उद्देश्य संभावित खतरे की पहले जानकारी देना है। जलस्तर तेजी से बढ़ने या अन्य असामान्य स्थिति सामने आने पर चेतावनी सिस्टम के जरिए संबंधित क्षेत्रों में अलर्ट जारी किया जा सकता है। इससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।
आपदा के दौरान पहाड़ी इलाकों में सबसे बड़ी चुनौती राहत टीमों का प्रभावित स्थान तक जल्दी पहुंचना होती है। इसी वजह से उत्तराखंड के कई इलाकों में स्थानीय लोगों को आपदा प्रबंधन और प्राथमिक राहत-बचाव की ट्रेनिंग दी जाती है। स्थानीय युवा और महिलाएं आपात स्थिति में फर्स्ट रिस्पॉन्डर की भूमिका निभा सकते हैं। वे राहत एजेंसियों के पहुंचने से पहले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने, प्राथमिक सहायता देने और जरूरी सूचनाएं प्रशासन तक पहुंचाने में मदद करते हैं।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में आपदा प्रबंधन के लिए कई एजेंसियां मिलकर काम करती हैं। जरूरत पड़ने पर सेना, NDRF और SDRF की टीमें राहत और बचाव अभियान में जुटती हैं। दुर्गम इलाकों में संचार व्यवस्था बनाए रखने के लिए आधुनिक संचार उपकरणों का इस्तेमाल भी किया जाता है। सड़कों और पुलों को भी पर्वतीय परिस्थितियों और तेज पानी के बहाव को ध्यान में रखकर मजबूत बनाने पर जोर दिया जाता है।
नेपाल में हुई प्राकृतिक आपदा ने यह सवाल फिर खड़ा किया है कि हिमालयी राज्यों में आपदा से पहले की तैयारी कितनी मजबूत है। उत्तराखंड में पहले से मौजूद आपदा प्रबंधन व्यवस्था, स्थानीय स्तर की ट्रेनिंग और आधुनिक निगरानी तकनीक संभावित नुकसान को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों को देखते हुए अर्ली वार्निंग सिस्टम, वैज्ञानिक निगरानी, सुरक्षित निर्माण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को और मजबूत करना जरूरी है।





