Pitru Paksha 2026: इस वर्ष पितृपक्ष का प्रारंभ 26 सितंबर 2026 से होने वाला है. यह अवधि पितरों की आत्मा की शांति के लिए खास माना जाता है. पितृपक्ष में लोग अपने…
Pitru Paksha 2026: इस वर्ष पितृपक्ष का प्रारंभ 26 सितंबर 2026 से होने वाला है. यह अवधि पितरों की आत्मा की शांति के लिए खास माना जाता है. पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं. सनातन धर्म में पिंडदान भी एक विशेष रीति है, जिसका पालन करना शुभ होता है. आमतौर पर आपने देखा होगा कि पितरों के लिए किए जाने वाले इन कार्यों को करने के लिए परिवार के पुरुष ही सही माने जाते हैं. इस कारण ही लोगों में गलत धारणा बन गई है कि सिर्फ पुरुष ही इस कर्म को कर सकते हैं. यह कार्य महिलाएं नहीं कर सकती है. जबकि धर्मग्रंथों में श्राद्ध के नियम काफी अलग बताए गए हैं
सनातन परंपराओं के अनुसार, किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके निमित्त श्राद्ध व तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं. धार्मिक मान्यता है कि इन कार्यों के जरिए मृतक के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य व्यक्त करना होता है. मगर सवाल यह है कि यदि किसी के परिवार में कोई पुरुष या उत्तराधिकारी नहीं है, तो क्या महिलाएं भी पिंडदान कर सकती है? आइए जानते हैं गरुड़ पुराण इस पर क्या कहता है
गरुड़ पुराण में श्राद्ध कर्म के महत्व और उसे करने वाले व्यक्ति के बारे में व्याख्या की गई है. इस ग्रंथ में एक श्लोक है, जिसमें बताया गया है कि पुत्र के अभाव में पत्नी, बहू और अन्य निकट संबंधियों द्वारा श्राद्ध करना चाहिए. यह श्लोक है- पुत्राभावे वधू: कुर्यात् आर्याभावे शिष्य एव वा
गरुड़ पुराण में वर्णित इस श्लोक का अर्थ है कि यदि पुत्र उपलब्ध न हो, तो परिस्थितियों के अनुसार, पत्नी या बहू श्राद्ध कर्म कर सकती है. यदि इनका अभाव है तो परिवार के अन्य सदस्य जैसे की भाई-भतीजा या भांजा भी श्राद्ध और पिंडदान कर सकते हैं. अगर ऐसे निकट संबंध के रिश्तेदार न हो तो, मित्र, शिष्य या अन्य योग्य मनुष्य भी श्राद्ध कर सकता है. इससे संकेत मिल रहा है कि श्राद्ध कर्म को लेकर सिर्फ पुरुषों की आवश्यकता वाली धारणा गलत है. यह रीति-रिवाज सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं है और जरूरत पड़ने पर घर की महिलाएं भी पिंडदान कर सकती है
धर्मशास्त्रों में मत थोड़े भिन्न भी हो सकते हैं. जैसे कि धार्मिक परंपराओं के अनुसार, पुत्र या निकट पुरुष संबंधियों को ही श्राद्ध व पिंडदान करने का अधिकार है. लेकिन पुत्र ने होने पर परिस्थितियां अलग होती है. इसलिए, पत्नी, पुत्रवधू और अन्य योग्य परिजन द्वारा श्राद्ध कर्म किया जा सकता है. इसलिए, ऐसा कहना भी सही नहीं है कि हर परिस्थिति में महिलाओं द्वारा पिंडदान होना चाहिए और न ही वे पूरी तरह इससे वंचित है. पारिवारिक स्थिति के अनुसार ही सही व्यक्ति का चुनाव किया जाता है
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सीता और राजा दशरथ की कथा का उल्लेख मिलता है. प्रचलित कथा बताती है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, सीता माता और लक्ष्मण गया पहुंचे थे. वहां उन्हें दशरथ जी का श्राद्ध करना था. कथा के मुताबिक, राम और लक्ष्मण दोनों ही श्राद्ध सामग्री एकत्रित करने गए थे. इसी दौरान माता सीता को राजा दशरथ के दर्शन हुए और उन्होंने सीता जी को समय निकलने से पूर्व ही पिंडदान करने की इच्छा व्यक्ति की. इसके बाद माता सीता ने फल्गु नदी, केतकी फूल और बरगद के पेड़ को साक्ष्य मानकर रेत का पिंड बनाकर राजा दशरथ का पिंडदान किया था. यह कथा मुख्य रूप से धार्मिक परंपराओं और गया की मान्यताओं में प्रचलित बताई जाती है. इसे महिलाओं द्वारा पिंडदान करने का मुख्य उदाहरण माना जाता है
धार्मिक ग्रंथों के बताई गई अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार, महिलाओं द्वारा श्राद्ध करने के वर्णन है. खासतौर पर पुत्र, पति, निकट पुरुष संबंधियों के अभाव में पत्नी या पुत्रवधू श्राद्ध कर्म कर सकती है. हालांकि, सनातन धर्म में कई संप्रदाय हैं और हर स्थान की और परिवार की परंपराएं अलग हो सकती है. इसलिए, वहां के नियम अलग भी हो सकते हैं. सलाह दी जाती है कि ऐसे कार्यों को स्वयं न करें बल्कि किसी योग्य ब्राह्मण की सलाह लेने के बाद ही करें
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)






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