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केंद्रीय कर्मचारियों की चमकेगी किस्मत, 8वें वेतन आयोग में बेसिक सैलरी और भत्तों पर हुआ बड़ा मंथन

🕐 21 Sep 2026, 12:40 am• 4 min padho • Chugal Khor News
केंद्रीय कर्मचारियों की चमकेगी किस्मत, 8वें वेतन आयोग में बेसिक सैलरी और भत्तों पर हुआ बड़ा मंथन

8th Pay Commission: केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन ढांचे को नए सिरे से तय करने के लिए आठवें वेतन आयोग की गतिविधियां तेज हो चुकी हैं. हाल ही में चंडीगढ़ में आयोजित की गई एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक अब पूरी तरह समाप्त हो चुकी है. यह अहम बैठक 16 सितंबर को शुरू हुई थी और तीन दिनों तक लगातार गहन विचार विमर्श के बाद 18 सितंबर को संपन्न हो गई. इस बैठक में विभिन्न कर्मचारी संगठनों और आयोग के प्रतिनिधियों के बीच कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और सेवा शर्तों से जुड़े कई गंभीर विषयों पर बातचीत हुई

चंडीगढ़ की इस अहम चर्चा के बाद अब आयोग की अगली बैठक देश के आईटी शहर बेंगलुरु में आयोजित की जाएगी. इन सभी बैठकों के दौरान सबसे बड़ा और चर्चित मुद्दा हमेशा फिटमेंट फैक्टर ही बना रहता है. कर्मचारी और पेंशनर्स से जुड़े संगठन सरकार और आयोग के सामने लगातार यह मांग रख रहे हैं कि इस बार के वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर को अधिक से अधिक रखा जाए ताकि कर्मचारियों को वास्तविक लाभ मिल सके

वेतन आयोग के तहत किसी भी कर्मचारी की नई बेसिक सैलरी तय करने में फिटमेंट फैक्टर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अगर इसे आसान गणित के जरिए समझें तो पूरा ढांचा साफ हो जाता है. मान लीजिए कि आठवां वेतन आयोग कर्मचारियों के लिए 2.75 का फिटमेंट फैक्टर तय करता है

इस स्थिति के लागू होते ही केंद्रीय कर्मचारियों की वर्तमान न्यूनतम बेसिक सैलरी 18000 रुपये से बढ़कर सीधे 49500 रुपये हो जाएगी. इसके विपरीत यदि आयोग कर्मचारी संगठनों की मांगों पर पूरी तरह सहमति जताते हुए फिटमेंट फैक्टर को 3.5 के स्तर पर निर्धारित कर देता है, तो न्यूनतम बेसिक सैलरी उछलकर सीधे 63000 रुपये के स्तर पर पहुंच जाएगी

इन दोनों स्थितियों के बीच सीधा 13500 रुपये का बड़ा अंतर देखने को मिलता है. यही मुख्य वजह है कि सभी कर्मचारी यूनियन और संगठन एकजुट होकर सरकार से अधिक से अधिक फिटमेंट फैक्टर लागू करने का दबाव बना रहे हैं. अगर पुराने वेतन आयोगों के इतिहास पर नजर डालें तो छठे वेतन आयोग के समय 1.86 का फिटमेंट फैक्टर तय किया गया था.वहीं सातवें वेतन आयोग के दौरान इसे बढ़ाकर 2.57 कर दिया गया था. अब आठवें वेतन आयोग से कर्मचारियों को उम्मीद है कि सरकार इस बार 3.5 के आंकड़े को छूने की कोशिश करेगी ताकि कर्मचारियों के हाथों में बेहतर तनख्वाह आ सके

वेतन वृद्धि के अलावा इस बैठक में महंगाई भत्ते यानी डीए को लेकर भी कई बुनियादी बदलावों की मांग रखी गई है. नेशनल काउंसिल ज्वाइंट कंसल्टेटिव मशीनरी ने आयोग के सामने यह बात रखी है कि डीए तय करने के लिए मौजूदा 12 महीने के औसत की व्यवस्था को बदला जाना चाहिए

इसकी जगह पर पिछले 6 महीने के औसत प्राइस इंडेक्स को आधार बनाया जाए. संगठनों का कहना है कि 6 महीने का औसत लेने से बाजार में बढ़ती महंगाई को तेजी से और अधिक सटीकता से ट्रैक किया जा सकेगा, जिससे कर्मचारियों को समय रहते महंगाई का उचित लाभ मिल सकेगा

इसके साथ ही एक और बेहद अहम मांग यह उठाई गई है कि जैसे ही महंगाई भत्ता 25 प्रतिशत के आंकड़े पर पहुंचे, वैसे ही उसे सीधे मूल वेतन में जोड़ दिया जाए यानी उसका विलय कर दिया जाए. वर्तमान नियमों में केंद्रीय कर्मचारियों के लिए ऐसा कोई स्वतः विलय का नियम लागू नहीं है. इसके अलावा कुछ कर्मचारी यूनियनों ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि साल में केवल दो बार यानी जनवरी और जुलाई में डीए बढ़ाने के बजाय इसे हर तिमाही यानी साल में कुल चार बार बढ़ाया जाना चाहिए. ऐसा होने से दैनिक जीवन में तेजी से बढ़ते खर्चों से निपटने में कर्मचारियों को भारी मदद मिलेगी

कर्मचारियों की न्यूनतम जरूरत और वेतन तय करने में फैमिली यूनिट का नियम बहुत बड़ा आधार बनता है. वर्तमान व्यवस्था में केवल तीन सदस्यों को एक फैमिली यूनिट माना जाता है, जिसमें कर्मचारी, जीवनसाथी और बच्चे शामिल होते हैं. कर्मचारी संगठनों का पुरजोर तर्क है कि अब फैमिली यूनिट की संख्या को 3 से बढ़ाकर 5 किया जाना चाहिए. इसके पीछे बहुत ठोस वजह यह है कि हर कर्मचारी के ऊपर अपने वृद्ध माता पिता के भरण पोषण, देखभाल और इलाज की पूरी जिम्मेदारी होती है. इसलिए माता पिता को भी इस गणना में शामिल करना सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से बेहद जरूरी है

पारिवारिक इकाई के अलावा कर्मचारियों के करियर में स्थिरता को रोकने के लिए चयन वेतनमान के नियमों में संशोधन की बात कही गई है. मौजूदा नियमों के अनुसार चयन वेतनमान का लाभ पाने के लिए कर्मचारी को 10 साल तक इंतजार करना पड़ता है, जिसे घटाकर हर 5 साल में लागू करने का सुझाव दिया गया है

इसके साथ ही आवास किराया भत्ता यानी एचआरए को भी वर्तमान बाजार के अनुसार बढ़ाने की मांग उठाई गई है. संगठनों का कहना है कि निचले और शुरुआती स्तर पर सेवा देने वाले कर्मचारियों को अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा मकान के किराए पर खर्च करना पड़ता है, इसलिए शुरुआती स्तर के कर्मचारियों के लिए एचआरए की दरों में विशेष बढ़ोतरी की जानी चाहिए ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें

स्रोत: NewsNationTV

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