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काला मोतिया: आंखों की इस बीमारी को न करें नजरअंदाज - The Hindi Pioneer

🕐 13 Aug 2026, 06:47 pm• 4 min padho • Chugal Khor News
काला मोतिया: आंखों की इस बीमारी को न करें नजरअंदाज - The Hindi Pioneer

ग्लूकोमा यानी काला मोतिया आंखों की गंभीर बीमारी है, जो किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है। इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती दौर में अक्सर इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई बार व्यक्ति को बीमारी का पता तब चलता है, जब आंखों की दृष्टि को नुकसान पहुंचना शुरू हो चुका होता है। एक बार ऑप्टिक नर्व को नुकसान हो जाने पर उसे पूरी तरह ठीक करना संभव नहीं होता। इसलिए समय पर जांच और उपचार बेहद जरूरी है

क्या है ग्लूकोमा

आंख के अंदर एक तरल पदार्थ लगातार बनता और बाहर निकलता रहता है। इसे एक्वियस ह्यूमर कहा जाता है। यह आंख के विभिन्न हिस्सों को पोषण देने में मदद करता है। जब इस तरल के बाहर निकलने की प्रक्रिया में रुकावट आती है तो आंख के अंदर का दबाव यानी इंट्राऑक्युलर प्रेशर (IOP) बढ़ सकता है

बढ़ा हुआ दबाव ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचा सकता है। यही नर्व आंख से मिलने वाली दृश्य जानकारी को मस्तिष्क तक पहुंचाती है। ऑप्टिक नर्व को हुआ नुकसान स्थायी हो सकता है और बीमारी बढ़ने पर दृष्टि गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है

हालांकि, यह भी जरूरी है कि केवल आंखों का दबाव बढ़ना ही ग्लूकोमा का एकमात्र कारण नहीं है। कुछ लोगों में सामान्य दबाव के बावजूद ऑप्टिक नर्व को नुकसान हो सकता है। इसलिए नियमित आंखों की जांच महत्वपूर्ण है

किन लोगों को अधिक खतरा

ग्लूकोमा का जोखिम कुछ लोगों में अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है। इनमें शामिल हैं

परिवार में किसी सदस्य को ग्लूकोमा होना

अधिक उम्र के लोग

मायोपिया यानी निकट दृष्टिदोष वाले व्यक्ति

मधुमेह से पीड़ित लोग

लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोग

आंख में चोट लगने का इतिहास रखने वाले व्यक्ति

जिन लोगों में आंखों के दबाव से संबंधित समस्या हो

इन संकेतों को न करें नजरअंदाज

ग्लूकोमा के शुरुआती चरण में लक्षण बहुत हल्के या बिल्कुल नहीं हो सकते। बीमारी बढ़ने पर किनारे की दृष्टि कम होना, धुंधला दिखाई देना, आंखों में दर्द या लालिमा, रोशनी के चारों ओर रंगीन घेरे दिखाई देना जैसे लक्षण कुछ प्रकार के ग्लूकोमा में हो सकते हैं

सिर्फ चश्मे का नंबर बदलना या अंधेरे में कम दिखाई देना ग्लूकोमा की निश्चित पहचान नहीं है। ऐसे लक्षण होने पर आंखों के विशेषज्ञ से जांच कराना बेहतर है

कैसे होती है जांच

ग्लूकोमा की पुष्टि के लिए नेत्र विशेषज्ञ कई जांचों का सहारा लेते हैं। इनमें प्रमुख हैं

टोनोमेट्री: आंख के अंदर के दबाव को मापने के लिए

ऑप्टिक नर्व की जांच: ऑप्टिक नर्व की स्थिति और संभावित नुकसान का आकलन किया जाता है

पेरिमेट्री या विजुअल फील्ड टेस्ट: आंखों के देखने के क्षेत्र में कमी का पता लगाने के लिए

गोनियोस्कोपी: आंख के ड्रेनेज एंगल की जांच करने के लिए

जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ऑप्टिक नर्व और रेटिना की विस्तृत जांच के लिए अन्य परीक्षण भी करा सकते हैं

इलाज के क्या विकल्प हैं

ग्लूकोमा का उपचार बीमारी के प्रकार, आंखों के दबाव और ऑप्टिक नर्व को हुए नुकसान के आधार पर तय किया जाता है। उपचार में मुख्य रूप से आई ड्रॉप्स/दवाएं, लेजर उपचार और सर्जरी शामिल हो सकते हैं

शुरुआती अवस्था में कई मरीजों में दवाओं की मदद से आंखों के दबाव को नियंत्रित किया जा सकता है। यदि दवाओं से पर्याप्त नियंत्रण न हो या बीमारी की स्थिति इसकी मांग करे तो डॉक्टर लेजर या सर्जरी की सलाह दे सकते हैं

ध्यान रखें कि ग्लूकोमा से पहले हो चुका दृष्टि नुकसान आमतौर पर वापस नहीं आता। उपचार का मुख्य उद्देश्य बीमारी को नियंत्रित करना और आगे होने वाले नुकसान को रोकना है

नियमित जांच है सबसे जरूरी

ग्लूकोमा कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। इसलिए केवल लक्षणों का इंतजार करना सही तरीका नहीं है। खासकर जिन लोगों में ग्लूकोमा का जोखिम अधिक है, उन्हें नेत्र विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार नियमित आंखों की जांच करानी चाहिए

यदि डॉक्टर ने ग्लूकोमा की दवा या आई ड्रॉप्स लिखी हैं तो उन्हें निर्धारित तरीके और समय पर लेना जरूरी है। दवा की मात्रा खुद से कम या ज्यादा न करें और उपचार बीच में बंद न करें

आंखों की रोशनी से जुड़ी किसी भी परेशानी को नजरअंदाज न करें। समय पर नेत्र जांच और विशेषज्ञ की सलाह ग्लूकोमा से होने वाले गंभीर नुकसान को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है

नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। आंखों से संबंधित लक्षण या दृष्टि में बदलाव होने पर योग्य नेत्र रोग विशेषज्ञ से जांच कराएं

स्रोत: The Hindi Pioneer

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