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FIR दर्ज होते ही गिरफ्तारी जरूरी नहीं, जानिए पुलिस कब कर सकती है Arrest -

🕐 07 Sep 2026, 08:01 pm• 3 min padho • Chugal Khor News
FIR दर्ज होते ही गिरफ्तारी जरूरी नहीं, जानिए पुलिस कब कर सकती है Arrest -

आमतौर पर लोगों के बीच यह धारणा रहती है कि पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज होते ही आरोपी की गिरफ्तारी हो जाती है। लेकिन कानून की स्थिति इससे अलग है। FIR दर्ज होना और गिरफ्तारी होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

FIR किसी घटना के संबंध में पुलिस को दी गई शुरुआती सूचना होती है। इसके बाद पुलिस मामले की जांच शुरू करती है। जांच के दौरान सबूत जुटाए जाते हैं, गवाहों के बयान दर्ज किए जाते हैं, घटनास्थल का निरीक्षण किया जाता है और जरूरत पड़ने पर फॉरेंसिक जांच भी कराई जाती है। ऐसे में केवल FIR दर्ज होने के आधार पर आरोपी की गिरफ्तारी जरूरी नहीं होती।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 35 में बिना वारंट गिरफ्तारी से जुड़े प्रावधान बताए गए हैं।

कानून के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में संज्ञेय अपराध करता है या विश्वसनीय शिकायत, सूचना अथवा उचित संदेह के आधार पर किसी ऐसे संज्ञेय अपराध में शामिल पाया जाता है, जिसकी अधिकतम सजा सात साल तक हो सकती है, तो निर्धारित कानूनी शर्तों के तहत पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के गिरफ्तारी कर सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर FIR में पुलिस को तुरंत गिरफ्तारी करनी ही होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट की है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि जिन मामलों में अधिकतम सजा सात साल तक है, उनमें सीधे गिरफ्तारी करना सामान्य नियम नहीं, बल्कि अपवाद होना चाहिए। ऐसे मामलों में BNSS की धारा 35(3) के तहत आरोपी को पहले नोटिस देकर जांच में शामिल होने के लिए कहा जाना चाहिए। यानी पुलिस के पास गिरफ्तारी की शक्ति जरूर है, लेकिन हर मामले में उसका इस्तेमाल करना अनिवार्य नहीं है। गिरफ्तारी की जरूरत है या नहीं, यह मामले की परिस्थितियों और जांच की जरूरत पर निर्भर करता है।

अगर आरोपी को जांच में शामिल होने के लिए नोटिस दिया गया है और वह उसका पालन नहीं करता, तो कानून में निर्धारित परिस्थितियों में पुलिस गिरफ्तारी कर सकती है।

इसके अलावा अगर जांच के दौरान पुलिस को आशंका हो कि आरोपी—

तो गिरफ्तारी की जरूरत पैदा हो सकती है।

कुछ परिस्थितियों में पुलिस मजिस्ट्रेट से गिरफ्तारी वारंट भी हासिल कर सकती है और उसके आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया जा सकता है।

किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि वह कानूनी रूप से दोषी साबित हो गया है। FIR जांच की शुरुआत का आधार है। इसके बाद पुलिस को सबूतों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ानी होती है।

इसी वजह से FIR, जांच और गिरफ्तारी—तीनों की कानूनी भूमिका अलग-अलग है।

BNSS में वरिष्ठ नागरिकों और अशक्त व्यक्तियों के लिए भी कुछ अतिरिक्त सुरक्षा का प्रावधान है।B धारा 35(7) के अनुसार, अगर किसी अपराध में अधिकतम सजा तीन साल से कम है और आरोपी की उम्र 60 वर्ष या उससे अधिक है या वह अशक्त है, तो उसकी गिरफ्तारी से पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मंजूरी जरूरी होती है। इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कम गंभीर अपराधों में बुजुर्गों और कमजोर लोगों की गिरफ्तारी बिना उचित समीक्षा के न हो।

पुलिस गिरफ्तारी तभी करती है जब कानून और मामले की परिस्थितियों के तहत उसकी जरूरत हो। गंभीरता, आरोपी का जांच में सहयोग, सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका, फरार होने की संभावना और अन्य परिस्थितियां गिरफ्तारी के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए FIR दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी अपने आप तय नहीं हो जाती। अंतिम कार्रवाई मामले की परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार होती है।

स्रोत: Filmitics

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