चित्रकूट, उत्तर प्रदेश: धर्मनगरी चित्रकूट में नवरात्रि के अवसर पर भक्ति और उत्सव का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। एक ओर मां दुर्गा के मंदिरों में दर्शन-पूजन…
चित्रकूट, उत्तर प्रदेश: धर्मनगरी चित्रकूट में नवरात्रि के अवसर पर भक्ति और उत्सव का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। एक ओर मां दुर्गा के मंदिरों में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है, तो दूसरी ओर देवी पंडालों में डांडिया और गरबा महोत्सव की धूम मची हुई है। दुर्गा अष्टमी के अवसर पर सद्गुरु सेवा ट्रस्ट, चित्रकूट परिसर में आयोजित भव्य गरबा महोत्सव में ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ और ‘अनेकता में एकता’ की सुंदर झलक देखने को मिली।
इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों से आए बालक-बालिकाओं, पुरुषों और महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। करीब 15 टीमें डांडिया और गरबा नृत्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति की विविधता और एकता का संदेश दे रही हैं। कार्यक्रम में गुजराती गरबा, डांडिया, बुंदेलखंडी लोकनृत्य और देशभक्ति से जुड़े नृत्यों ने दर्शकों का मन मोह लिया।
धर्मनगरी चित्रकूट में नवरात्रि के दौरान धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी विशेष आकर्षण रहता है। देवी पंडालों में आयोजित गरबा और डांडिया कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में लोग शामिल हो रहे हैं।
सद्गुरु सेवा ट्रस्ट परिसर में दुर्गा अष्टमी पर आयोजित महोत्सव में विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने अलग-अलग टोलियां बनाकर पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए। रंग-बिरंगे परिधानों, संगीत और सामूहिक नृत्य ने आयोजन को उत्सवमय बना दिया।
इस कार्यक्रम को देखने के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। महोत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम भी बन रहा है।
सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट के ट्रस्टी एवं निदेशक डॉ. इलेश जैन ने बताया कि चित्रकूट के ग्रामीण अंचल में समय-समय पर ऐसे सांस्कृतिक आयोजन होते रहने चाहिए। इससे लोगों के बीच एकता, आपसी स्नेह और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।
उन्होंने बताया कि ट्रस्ट परिसर में नवरात्रि के नौ दिनों तक डांडिया कार्यक्रम आयोजित करने की परंपरा लगभग 32 से 35 वर्षों से चली आ रही है। इस परंपरा की नींव ट्रस्ट के प्रथम अध्यक्ष स्वर्गीय अरविंद भाई मफतलाल, उनके पिता पद्मश्री डॉ. बी.के. जैन और माता उषा जैन ने रखी थी।
डॉ. इलेश जैन के अनुसार, इस आयोजन में जाति, धर्म और ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सभी समुदायों के लोग मिल-जुलकर गरबा और डांडिया नृत्य में भाग लेते हैं। यही सामूहिक सहभागिता इस आयोजन को विशेष बनाती है।
सद्गुरु सेवा ट्रस्ट परिसर में आयोजित गरबा महोत्सव केवल नृत्य और मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता का संदेश भी देता है।
कार्यक्रम में अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की विविध परंपराओं को एक मंच पर देखने का अवसर मिला। गुजरात का पारंपरिक गरबा और डांडिया, बुंदेलखंडी लोकनृत्य तथा देशभक्ति से जुड़ी प्रस्तुतियों ने भारतीय संस्कृति के विभिन्न रंगों को सामने रखा।
आयोजन में शामिल लोगों ने सामूहिक रूप से उत्सव मनाकर यह संदेश दिया कि भाषा, क्षेत्र और परंपराओं में विविधता होने के बावजूद भारतीय संस्कृति लोगों को एक सूत्र में जोड़ती है।
डॉ. इलेश जैन ने कहा कि भले ही देश के लोग अलग-अलग राज्यों में रहते हों, लेकिन उनकी परंपराएं, संस्कृति और संस्कार आपस में जुड़े हुए हैं।
उन्होंने कहा कि गरबा जैसे सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से इन परंपराओं को सहेजने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलता है। जब लोगों के बीच आपसी भाईचारा बढ़ेगा, तभी ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ और ‘अनेकता में एकता’ की भावना और मजबूत होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे आयोजन समाज में आपसी स्नेह बढ़ाने के साथ भारतीय संस्कृति और संस्कारों को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चित्रकूट में सद्गुरु सेवा ट्रस्ट का गरबा महोत्सव नवरात्रि की धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विविधता का अनूठा उदाहरण बनकर सामने आया है। नौ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों की सहभागिता सामाजिक समरसता का संदेश देती है।
मां दुर्गा की आराधना, पारंपरिक नृत्य और सामूहिक उत्सव के माध्यम से यह आयोजन लोगों को एक-दूसरे की संस्कृति को समझने और सम्मान देने का अवसर प्रदान करता है।
चित्रकूट का यह गरबा महोत्सव संदेश देता है कि विविधता में एकता ही भारत की पहचान है और अपनी संस्कृति, परंपराओं तथा संस्कारों को सहेजकर ही आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है।






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