इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक बड़ा ऐलान करते हुए स्कूलों में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने की योजना का खुलासा किया है. दरअसल, उनका यह प्रस्ताव…
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक बड़ा ऐलान करते हुए स्कूलों में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने की योजना का खुलासा किया है. दरअसल, उनका यह प्रस्ताव सिर्फ ड्रेस कोड तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें हर क्लास में विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने और कुछ अभिभावकों के लिए इतालवी भाषा सीखना अनिवार्य करने जैसे प्रावधान भी शामिल हैं
मेलोनी ने रविवार को रोम में अपनी पार्टी ब्रदर्स ऑफ इटली के युवा मोर्चे के एक बड़े आयोजन में यह प्रस्ताव सार्वजनिक किया. उन्होंने कहा कि छात्राएं स्कूल में खुले चेहरे के साथ आनी चाहिए और किसी भी तथाकथित परंपरा के नाम पर किसी युवती को अपना चेहरा छुपाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. सोशल मीडिया पर उनके इस बयान को महिला समानता और छात्राओं की आजादी से जोड़कर देखा जा रहा है
🚨🇮🇹 Meloni announces a BURQA BAN in schools, plus a LIMIT on the number of foreign students per class!!"The proposed measure will introduce an obligation for the parents of foreign students with serious school-integration problems to learn Italian, and it will introduce a BAN…
एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्ताव के तहत हर कक्षा में विदेशी मूल के छात्रों की संख्या पर कानूनी सीमा तय की जाएगी. हालांकि मेलोनी ने अभी यह साफ नहीं किया कि यह सीमा कितनी होगी. इसके अलावा जिन विदेशी छात्रों के परिवारों को स्कूल व्यवस्था में घुलने-मिलने में गंभीर दिक्कतें आ रही हैं उनके अभिभावकों के लिए इतालवी भाषा सीखना अनिवार्य किया जाएगा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूरोप में फ्रांस पहला देश था जिसने 2011 में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले पूरी तरह प्रतिबंधित किए थे. इसके बाद बेल्जियम ने भी उसी साल ऐसा ही कानून लागू किया था. इसके अलावा ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, बुल्गारिया, नीदरलैंड्स और स्विट्जरलैंड जैसे यूरोपीय देश भी अलग-अलग स्तर पर ऐसी पाबंदियां लगा चुके हैं. स्विट्जरलैंड में तो 2021 में हुए जनमत संग्रह में करीब 51 प्रतिशत मतदाताओं ने इस बैन के पक्ष में वोट दिया था
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक दुनियाभर में करीब दो दर्जन से ज्यादा देशों में चेहरा ढकने वाले परिधानों पर किसी न किसी रूप में पाबंदी है, जिनमें चीन, श्रीलंका, तुर्की, ट्यूनीशिया, मोरक्को और चाड जैसे मुस्लिम-बहुल और गैर-मुस्लिम दोनों तरह के देश शामिल हैं. वहीं, दूसरी तरफ अफगानिस्तान जैसे देशों में बुर्का पहनना अनिवार्य है जो इस पूरे मसले को और उलझा देता है
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भारत में भी हिजाब को लेकर एक बड़ा विवाद हो चुका है. बता दें कर्नाटक राज्य में शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने को लेकर कुछ साल पहले तीखी बहस छिड़ी थी. जिसमें छात्राओं के ड्रेस कोड और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर अदालत तक मामला पहुंचा था. यह मामला आज भी भारत में धार्मिक पोशाक बनाम शिक्षण संस्थानों के नियमों की बहस का एक बड़ा उदाहरण माना जाता है
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एक तरफ कुछ मुस्लिम संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने इसे मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाने वाला और बंटवारा पैदा करने वाला कदम बताया है. वहीं, दूसरी तरफ इटली में कुछ उदारवादी मुस्लिम समूहों ने बीते वर्षों में इसी तरह के प्रस्तावों का स्वागत करते हुए इसे महिला अधिकारों की जीत भी बताया था. इससे साफ है कि मुस्लिम समुदाय के भीतर भी इस मुद्दे पर एक राय नहीं है
मेलोनी सरकार का तर्क है कि पूर्ण चेहरा-ढकाव को किसी परंपरा या रिवाज के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता और यह सीधे तौर पर महिलाओं की आजादी से जुड़ा मसला है. सरकार पहले से ही जबरन विवाह और कथित 'वर्जिनिटी टेस्ट' जैसी प्रथाओं पर भी सख्त कानून बनाने की बात कर चुकी है जिसे वह धार्मिक कट्टरता और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के खिलाफ अपनी लड़ाई का हिस्सा बताती है
बुर्का पूरे शरीर को सिर से पैर तक ढकने वाला परिधान है, जिसमें आंखों के ऊपर भी जाली जैसा कपड़ा होता है. वहीं, नकाब चेहरे को ढकता है लेकिन आंखों का हिस्सा खुला छोड़ देता है. इसके उलट हिजाब सिर और गर्दन को ढकता है लेकिन चेहरा पूरी तरह खुला रहता है. मेलोनी के प्रस्ताव में साफ किया गया है कि यह प्रतिबंध सिर्फ चेहरा ढकने वाले परिधानों पर लागू होगा, हिजाब पर नहीं
जानकारी के मुताबिक इटली में पहले से ही 2010 से एक दिशानिर्देश लागू है, जिसके तहत किसी भी कक्षा में गैर-इतालवी नागरिकता वाले छात्रों की संख्या 30 प्रतिशत तक सीमित रखने की सलाह दी गई है. हालांकि इस नियम का पालन हमेशा सख्ती से नहीं हुआ है. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक इटली के स्कूलों में गैर-इतालवी नागरिकता वाले छात्रों की हिस्सेदारी करीब 11.6 प्रतिशत है और इनकी कुल संख्या करीब 9 लाख 30 हजार के आसपास आंकी गई है
Il mio intervento in diretta da Fenix
यह प्रस्ताव अभी सिर्फ ऐलान के स्तर पर है और जल्द ही इटली की कैबिनेट के सामने रखा जाएगा. इसके बाद इसे संसद से भी मंजूरी लेनी होगी. जिसके लिए 60 दिन के भीतर प्रक्रिया पूरी करनी होगी. यह अभी कानून नहीं बना है बल्कि प्रस्ताव के तौर पर ही सामने आया है
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बता दें इससे पहले जुलाई 2026 में मेलोनी की पार्टी ने संसद में एक बिल पेश किया था जिसमें सार्वजनिक स्थानों, दफ्तरों, दुकानों और शिक्षण संस्थानों समेत पूरे देश में बुर्का-नकाब पर प्रतिबंध लगाने और उल्लंघन पर 300 से 3000 यूरो तक जुर्माने का प्रस्ताव था. उस बिल को 'इस्लामिक अलगाववाद' के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा बताया गया था और इसमें मस्जिदों की फंडिंग को भी नियमित करने की बात कही गई थी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इटली में 2027 में आम चुनाव होने हैं और इमिग्रेशन का मुद्दा इस चुनाव में केंद्र में रहने की उम्मीद है. मेलोनी को अपनी ही विचारधारा के एक और कट्टर दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी रिटायर्ड जनरल रॉबर्टो वन्नाची से चुनौती मिल रही है जो प्रवासन को लेकर और भी सख्त कदमों की मांग करते रहे हैं. माना जा रहा है कि यही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा मेलोनी को इस तरह के सख्त फैसलों की तरफ धकेल रही है
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