Security Forces: सुरक्षा बलों में तैनात जवान जहां देश की सुरक्षा के लिए हथियार उठाते हैं, वहीं कई बार इन्हीं हथियारों का निशाना उनके अपने साथी बन जाते हैं. सुर…

Security Forces: सुरक्षा बलों में तैनात जवान जहां देश की सुरक्षा के लिए हथियार उठाते हैं, वहीं कई बार इन्हीं हथियारों का निशाना उनके अपने साथी बन जाते हैं. सुरक्षा बलों के भीतर आपसी विवाद या फायरिंग की ऐसी घटनाओं को ‘फ्रैट्रिसाइड’ (Fratricide) कहा जाता है. ये घटनाएं न सिर्फ जवानों की जान लेती हैं, बल्कि सुरक्षा बलों के सामने मानसिक तनाव, अनुशासन और कार्यस्थल पर बढ़ते दबाव जैसी गंभीर चुनौतियों को भी सामने लाती हैं

इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा सरकारी आंकड़ों से लगाया जा सकता है. गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में सुरक्षा बलों में आपसी विवाद और फायरिंग की घटनाओं में 24 से ज्यादा जवानों की मौत हुई है. फ्रैट्रिसाइड की गंभीरता एक बार फिर 29 सितंबर 2026 को जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में सामने आई. यहां केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक जवान ने कथित तौर पर अपने साथियों पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी. इस घटना में एक असिस्टेंट कमांडेंट समेत चार जवानों की मौत हो गई. घटना के बाद सुरक्षा बलों और प्रशासन के स्तर पर जांच शुरू की गई. फायरिंग की वजह और घटना से पहले जवान के व्यवहार समेत कई पहलुओं की जांच की जा रही है

सुरक्षा बलों के संदर्भ में Fratricide का मतलब ऐसी घटना से है, जिसमें कोई जवान या सुरक्षाकर्मी अपने ही साथी जवानों या उसी सुरक्षा संगठन के सदस्यों पर हमला कर देता है. इसमें गोलीबारी जैसी घटनाएं शामिल हो सकती हैं

ऐसी घटनाओं के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं. इनमें आपसी विवाद, ड्यूटी से जुड़ा तनाव, अनुशासनात्मक कार्रवाई, लंबे समय तक काम का दबाव या व्यक्तिगत समस्याएं जैसे कारण जांच का हिस्सा बनते हैं. हालांकि, हर घटना के पीछे एक ही वजह नहीं होती और वास्तविक कारण जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकते हैं

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों के दौरान सुरक्षा बलों में फ्रैट्रिसाइड से जुड़ी घटनाओं में 24 से अधिक जवानों की मौत हुई है. ये आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा बलों के भीतर ऐसी घटनाएं भले ही आम न हों, लेकिन जब होती हैं तो उनका असर बेहद गंभीर होता है

सुरक्षा बलों में जवानों को कठिन परिस्थितियों में लंबे समय तक ड्यूटी करनी पड़ती है. ऐसे में आपसी विवाद या तनाव की किसी भी घटना का असर सिर्फ संबंधित जवानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे यूनिट के मनोबल और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है. कठुआ की घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि सुरक्षा बलों में आपसी तनाव और विवाद को समय रहते पहचानने और रोकने के लिए मौजूदा व्यवस्था कितनी प्रभावी है

सुरक्षा बलों में फ्रैट्रिसाइड और आत्महत्या जैसी घटनाओं के पीछे कई मानसिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं. इनमें लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में तैनाती और लगातार हाई-अलर्ट रहने से बढ़ने वाला मानसिक तनाव, परिवार से दूर रहने के कारण घरेलू या जमीन-जायदाद से जुड़े विवादों को सुलझा न पाना, जरूरत के समय छुट्टी न मिलना या उसमें देरी, साथियों या वरिष्ठ अधिकारियों के साथ विवाद और कार्यस्थल पर तनाव शामिल हैं. इसके अलावा, ड्यूटी के दौरान जवानों के पास हथियारों की आसान उपलब्धता भी तनाव या गुस्से की स्थिति में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकती है

इस समस्या को रोकने के लिए भारतीय सेना और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की ओर से कई कदम उठाए गए हैं. तनाव से जूझ रहे जवानों की पहचान और उन्हें मदद देने के लिए यूनिट स्तर पर काउंसलिंग और मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था की गई है

गृह मंत्रालय ने सुरक्षा बलों में आत्महत्या और आपसी झगड़ों की वजहों का अध्ययन करने और उनकी रोकथाम के उपाय सुझाने के लिए विशेष टास्क फोर्स भी गठित की है. इसके अलावा जवानों का मानसिक तनाव कम करने के लिए योग, ध्यान और ‘मिशन जिंदगी’ जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. जवानों की समस्याओं को समय पर सुनने और अधिकारियों के साथ संवाद बेहतर करने के लिए ‘ग्रीवांस चौपाल’ और वरिष्ठ अधिकारियों से सीधे बातचीत की व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है