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6 संभल: उत्तर प्रदेश की राजनीति में संभल विधानसभा सीट का अपना अलग सियासी इतिहास रहा है। यहां चुनावी मुकाबले सिर्फ दलों के बीच नहीं रहे, बल्कि बदलते सामाजिक समीकरणों और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव ने भी नतीजों को प्रभावित किया है। कभी निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की तो कभी रिपब्लिकन पार्टी और जनसंघ का प्रभाव नजर आया। इसके बाद शफीकुर्रहमान बर्क ने लंबे समय तक इस सीट पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। वहीं 1996 के बाद समाजवादी पार्टी ने ऐसा सियासी आधार बनाया कि पिछले छह विधानसभा चुनावों से लगातार उसके उम्मीदवार इकबाल महमूद जीत दर्ज करते आ रहे हैं। अब 2027 में सवाल है कि क्या यह सिलसिला जारी रहेगा या संभल के चुनावी इतिहास में कोई नया अध्याय जुड़ेगा?
संभल विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास कई राजनीतिक बदलावों का गवाह रहा है। 1957 के चुनाव में महमूद हुसैन खान ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की। 1962 में रिपब्लिकन पार्टी के महमूद हसन खान विजयी हुए, जबकि 1967 में जनसंघ के महेंद्र कुमार ने जीत हासिल की। इसके बाद 1969 में भारतीय क्रांति दल के महमूद हसन खान ने बाजी मारी।1974 में शफीकुर्रहमान बर्क ने पहली बार संभल विधानसभा सीट से जीत दर्ज की। इसके बाद 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर भी उन्होंने जीत हासिल की। 1985 और 1989 के चुनाव में भी बर्क विजयी रहे। इस दौर में संभल की राजनीति में उनका प्रभाव खास तौर पर देखने को मिला।हालांकि 1980 के चुनाव में कांग्रेस के शरियतुल्ला ने बर्क को पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की थी। यानी बर्क के प्रभाव के बीच भी संभल का चुनावी मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा।
1991 में इकबाल महमूद ने जनता दल के टिकट पर जीत हासिल की, जबकि 1993 में बीजेपी के सत्य प्रकाश ने संभल सीट पर जीत दर्ज की। यह इस सीट पर बीजेपी की महत्वपूर्ण जीत थी। लेकिन इसके बाद 1996 में इकबाल महमूद समाजवादी पार्टी के टिकट पर लौटे और उन्होंने बीजेपी के सत्य प्रकाश को हराया। इसके बाद सपा ने इस सीट पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली।इकबाल महमूद ने 1996 के बाद 2002, 2007, 2012, 2017 और 2022 में लगातार जीत दर्ज की। यानी छह विधानसभा चुनावों से संभल सीट पर सपा का कब्जा है।
2022 के विधानसभा चुनाव में इकबाल महमूद को 79,248 वोट मिले, जबकि बीजेपी के डॉ. अरविंद को 59,976 वोट मिले। वहीं AIMIM के जियाउर्रहमान को भी करीब 59 हजार वोट मिले। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 में इकबाल महमूद की जीत का अंतर करीब 19,272 वोट रहा।यह आंकड़ा आपके दिए 1,07,073 बनाम 65,376 वाले आंकड़ों से अलग है; इसलिए वेबसाइट कॉपी में ECI के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों को आधार बनाया गया है।
संभल की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। मुस्लिम मतदाता यहां एक बड़ा सामाजिक समूह हैं, जबकि विभिन्न ओबीसी और एससी समुदाय भी चुनावी गणित में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में 2027 में मुकाबला केवल उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि सामाजिक गठजोड़ और वोटों के ध्रुवीकरण पर भी निर्भर कर सकता है।सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सपा इकबाल महमूद के जरिए अपने लंबे राजनीतिक प्रभाव को बरकरार रख पाएगी? क्या बीजेपी अपने सामाजिक आधार का विस्तार कर सपा को चुनौती दे पाएगी? और क्या कोई तीसरा राजनीतिक दल मुकाबले में वोटों का समीकरण बदल सकता है?संभल का इतिहास बताता है कि यहां राजनीतिक समीकरण समय के साथ कई बार बदले हैं। अब 2027 में नजर इस बात पर होगी कि छह चुनावों से चला आ रहा सपा का सिलसिला जारी रहता है या फिर संभल एक बार फिर अपने चुनावी इतिहास में बड़ा बदलाव दर्ज करता है।
रश्मि सिंह एक अनुभवी पत्रकार और डिजिटल कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता, न्यूज़ रिपोर्टिंग और डिजिटल मीडिया का व्यापक अनुभव है। उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है और अपने पत्रकारिता करियर में कई बड़े मीडिया संस्थानों और न्यूज़ चैनलों के साथ काम किया है।राजनीति, जनसरोकार, उत्तर प्रदेश की सियासत और समसामयिक मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ है। खबरों को सरल, तथ्यपरक और पाठकों के लिए रोचक अंदाज में प्रस्तुत करना उनकी लेखन शैली की खासियत है। डिजिटल पत्रकारिता के बदलते दौर में रश्मि सिंह का प्रयास है कि पाठकों तक तेज, विश्वसनीय और आसान भाषा में तथ्य आधारित खबरें पहुंचें।
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