वाराणसी कैंट विधानसभा सीट… प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की वो सीट, जहां पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से बीजेपी का दबदबा कायम है। चुनाव यह…

वाराणसी कैंट विधानसभा सीट… प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की वो सीट, जहां पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से बीजेपी का दबदबा कायम है। चुनाव यहां हर बार होता है, मुकाबला भी होता है, लेकिन कई चुनावों में जीत का अंतर इतना बड़ा रहा कि विपक्ष के लिए चुनौती आसान नहीं रही। और इस सीट की सियासी कहानी में एक और नाम लगातार सामने आता है—श्रीवास्तव परिवार। बीजेपी के टिकट पर ज्योत्सना श्रीवास्तव से लेकर उनके बेटे सौरभ श्रीवास्तव तक इस परिवार ने कैंट की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।लेकिन अब बड़ा सवाल है—2027 में क्या बीजेपी एक बार फिर इस सीट पर अपना दबदबा कायम रख पाएगी? या विपक्ष इस मजबूत सियासी किले को चुनौती देने के लिए कोई नया समीकरण तैयार करेगा?

वाराणसी कैंट विधानसभा सीट पर 2017 का चुनाव बीजेपी के लिए बेहद अहम रहा। बीजेपी के सौरभ श्रीवास्तव ने कांग्रेस के अनिल श्रीवास्तव को बड़े अंतर से हराया। उनकी जीत का अंतर 61 हजार से ज्यादा वोटों का रहा।इसके बाद 2022 में बीजेपी ने अपनी स्थिति और मजबूत की। सौरभ श्रीवास्तव को करीब एक लाख 48 हजार वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी की पूजा यादव को करीब 61 हजार वोट मिले। इस चुनाव में सौरभ श्रीवास्तव की जीत का अंतर लगभग 86 हजार 844 वोट रहा।यानी आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो विधानसभा चुनावों में कैंट सीट पर बीजेपी की बढ़त काफी मजबूत रही है।

कैंट सीट की कहानी सिर्फ सौरभ श्रीवास्तव की जीत तक सीमित नहीं है। इस सीट पर श्रीवास्तव परिवार की राजनीतिक मौजूदगी इससे पहले भी रही है।2007 और 2012 में डॉ. ज्योत्सना श्रीवास्तव बीजेपी के टिकट पर इस सीट से विधायक रहीं। इसके बाद 2017 में उनके बेटे सौरभ श्रीवास्तव ने चुनाव जीतकर परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया।यही वजह है कि वाराणसी कैंट की सियासत में बीजेपी के साथ-साथ श्रीवास्तव परिवार की राजनीतिक पकड़ भी चर्चा का विषय रही है।

वाराणसी कैंट एक प्रमुख शहरी विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे में यहां चुनावी समीकरण ग्रामीण सीटों से अलग नजर आते हैं। कायस्थ, ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं के साथ मुस्लिम, यादव और दलित मतदाताओं की भूमिका भी चुनावी गणित में महत्वपूर्ण मानी जाती है।हालांकि किसी भी समुदाय के मतदाताओं के चुनावी रुख को पहले से तय मानना उचित नहीं होगा। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, संगठन और गठबंधन जैसे कई कारक चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

2022 में बड़े अंतर से जीत के बाद 2027 में बीजेपी के सामने अपनी पिछली सफलता को दोहराने की चुनौती होगी। वहीं विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या वह कैंट में मुकाबले को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बना सकता है?विपक्षी दलों की रणनीति उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक सक्रियता और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच समर्थन जुटाने पर निर्भर कर सकती है।लेकिन वाराणसी कैंट की सियासत का सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या पिछले चुनावों जैसी बड़ी बढ़त के साथ बीजेपी एक बार फिर इस सीट पर अपना दबदबा कायम रख पाएगी, या 2027 में कैंट का चुनावी मुकाबला कोई नया मोड़ लेगा?क्योंकि यहां लड़ाई सिर्फ एक विधानसभा सीट की नहीं होगी। यह वाराणसी के सबसे मजबूत शहरी सियासी गढ़ों में से एक की अगली परीक्षा भी होगी।

रश्मि सिंह एक अनुभवी पत्रकार और डिजिटल कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता, न्यूज़ रिपोर्टिंग और डिजिटल मीडिया का व्यापक अनुभव है। उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है और अपने पत्रकारिता करियर में कई बड़े मीडिया संस्थानों और न्यूज़ चैनलों के साथ काम किया है।राजनीति, जनसरोकार, उत्तर प्रदेश की सियासत और समसामयिक मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ है। खबरों को सरल, तथ्यपरक और पाठकों के लिए रोचक अंदाज में प्रस्तुत करना उनकी लेखन शैली की खासियत है। डिजिटल पत्रकारिता के बदलते दौर में रश्मि सिंह का प्रयास है कि पाठकों तक तेज, विश्वसनीय और आसान भाषा में तथ्य आधारित खबरें पहुंचें।