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3 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात बिछने लगी है और गाजियाबाद की लोनी विधानसभा सीट पर भी मुकाबले को लेकर चर्चाएं तेज हैं। यह सीट लंबे समय से जातीय समीकरण, स्थानीय नेताओं के प्रभाव और बदलते राजनीतिक गठबंधनों के लिए चर्चा में रही है। एक तरफ बीजेपी के विधायक नंदकिशोर गुर्जर हैं, तो दूसरी तरफ मदन भैय्या की राजनीतिक वापसी को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या बीजेपी 2027 में भी अपना दबदबा कायम रख पाएगी या विपक्ष इस सीट पर नया सियासी समीकरण तैयार करेगा?

लोनी विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास खेकड़ा क्षेत्र से भी जुड़ा रहा है। मदन भैय्या का इस इलाके की राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव रहा, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नंदकिशोर गुर्जर ने जीत दर्ज कर सियासी समीकरण बदल दिए। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी अपनी सीट बचाने में कामयाब रही।

2022 के चुनाव में नंदकिशोर गुर्जर को 1,27,410 वोट मिले, जबकि राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के टिकट पर सपा गठबंधन से चुनाव लड़ने वाले मदन भैय्या को 1,18,734 वोट हासिल हुए। दोनों के बीच करीब 8,700 वोटों का अंतर रहा। वहीं, निर्दलीय उम्मीदवार रंजीता धामा को 27 हजार से अधिक वोट मिले, जबकि बहुजन समाज पार्टी को करीब 25 हजार वोट प्राप्त हुए।

इन आंकड़ों से साफ है कि लोनी में मुख्य मुकाबले के साथ अन्य उम्मीदवारों का प्रदर्शन भी चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

2024 के लोकसभा चुनाव में गाजियाबाद सीट के अंतर्गत आने वाले लोनी विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी ने बढ़त बनाए रखी। बीजेपी के अतुल गर्ग को यहां 1,43,522 वोट मिले, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन की उम्मीदवार डॉली शर्मा को 1,21,668 वोट हासिल हुए।

लोकसभा चुनाव के ये आंकड़े बीजेपी की स्थिति को मजबूती देते हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव का मुकाबला अलग मुद्दों, उम्मीदवारों और स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करेगा। इसलिए 2024 की बढ़त को 2027 की जीत की गारंटी नहीं माना जा सकता।

लोनी सीट पर मुस्लिम, गुर्जर और दलित मतदाताओं की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है। इनके अलावा जाट, ब्राह्मण, त्यागी और अन्य पिछड़ी जातियों के मतदाताओं का रुख भी चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकता है।

बीजेपी के लिए चुनौती अपने मौजूदा समर्थन आधार को बनाए रखने की होगी। वहीं, विपक्ष के सामने अलग-अलग सामाजिक वर्गों का समर्थन हासिल करने और वोटों के बिखराव को रोकने की चुनौती होगी। 2022 में रंजीता धामा और बीएसपी को मिले वोटों ने दिखाया था कि मुकाबले में तीसरे उम्मीदवारों की भूमिका भी अहम हो सकती है।

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद मतदाता सूची में बदलाव को लेकर भी राजनीतिक चर्चा हो रही है। हालांकि, मतदाताओं की संख्या में अंतिम बदलाव और उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन आधिकारिक मतदाता सूची सामने आने के बाद ही किया जा सकेगा।

लोनी विधानसभा सीट पर 2027 का चुनाव कई सवालों के जवाब देगा। क्या नंदकिशोर गुर्जर बीजेपी की जीत का सिलसिला जारी रखेंगे? क्या मदन भैय्या दोबारा मजबूत चुनौती पेश कर पाएंगे? या कोई नया उम्मीदवार मुकाबले को त्रिकोणीय बना देगा?

फिलहाल, लोनी की सियासत में जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और विपक्षी वोटों का बंटवारा निर्णायक कारक बन सकते हैं। अंतिम नतीजा चुनावी माहौल, उम्मीदवारों और मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।

रश्मि सिंह एक अनुभवी पत्रकार और डिजिटल कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता, न्यूज़ रिपोर्टिंग और डिजिटल मीडिया का व्यापक अनुभव है। उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है और अपने पत्रकारिता करियर में कई बड़े मीडिया संस्थानों और न्यूज़ चैनलों के साथ काम किया है।राजनीति, जनसरोकार, उत्तर प्रदेश की सियासत और समसामयिक मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ है। खबरों को सरल, तथ्यपरक और पाठकों के लिए रोचक अंदाज में प्रस्तुत करना उनकी लेखन शैली की खासियत है। डिजिटल पत्रकारिता के बदलते दौर में रश्मि सिंह का प्रयास है कि पाठकों तक तेज, विश्वसनीय और आसान भाषा में तथ्य आधारित खबरें पहुंचें।

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