लखनऊ। उत्तर प्रदेश के गांवों में अब महिलाएं सिर्फ घर की जरूरतों के लिए पानी का इंतजाम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे गांव को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की मु…
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के गांवों में अब महिलाएं सिर्फ घर की जरूरतों के लिए पानी का इंतजाम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे गांव को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की मुहिम में अहम भूमिका निभा रही हैं। कभी घर-परिवार की जिम्मेदारियां संभालने वाली ग्रामीण महिलाएं अब हाथों में फील्ड टेस्ट किट (एफटीके) लेकर पानी की गुणवत्ता परख रही हैं। जल जीवन मिशन के तहत प्रदेश की करीब पांच लाख प्रशिक्षित महिलाएं ‘सुजलाम शक्ति समूह’ के माध्यम से गांव-गांव जल प्रहरी की भूमिका निभा रही हैं। इन महिलाओं की भागीदारी से ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल गुणवत्ता की निगरानी का मजबूत नेटवर्क तैयार हुआ है। वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2026-27 तक प्रदेश में एफटीके के जरिए 1,43,21,260 जल नमूनों की जांच की जा चुकी है। जल जीवन मिशन 1.0 के तहत प्रदेश के प्रत्येक राजस्व गांव से पांच महिलाओं को पेयजल गुणवत्ता की जांच का प्रशिक्षण दिया गया था। अब जल जीवन मिशन 2.0 के तहत यही प्रशिक्षित महिलाएं सुजलाम शक्ति समूह के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं। इस पहल से गांवों में पेयजल निगरानी व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर मजबूती मिली है। साथ ही ग्रामीण महिलाओं को सामाजिक भागीदारी और आर्थिक सशक्तीकरण का नया अवसर मिला है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के साथ आंगनबाड़ी और आशा कार्यकत्रियों को भी पात्रता के आधार पर प्रशिक्षण देकर इस अभियान से जोड़ा गया है।
प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद महिलाओं को फील्ड टेस्ट किट उपलब्ध कराई जाती है। इसकी मदद से वे घरों में लगे नल कनेक्शन, हैंडपंप और स्वास्थ्य केंद्रों सहित विभिन्न पेयजल स्रोतों से पानी के नमूने लेकर उनकी प्राथमिक जांच करती हैं। इस दौरान पानी में आयरन, नाइट्रेट, क्लोराइड समेत विभिन्न अशुद्धियों की मौजूदगी परखी जाती है। महिलाएं हर महीने निर्धारित प्रक्रिया के तहत पेयजल की गुणवत्ता जांचती हैं। बैक्टीरियोलॉजिकल खामियां सामने आने पर नमूनों को विस्तृत परीक्षण के लिए जिला और राज्य स्तरीय प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। पेयजल की गुणवत्ता की जांच भारतीय मानक आईएस-10500:2012 के आधार पर की जाती है।
सुजलाम शक्ति समूह की पहल महिलाओं को सामाजिक जिम्मेदारी देने के साथ उनकी आय बढ़ाने का माध्यम भी बन रही है। एफटीके से जल नमूनों की जांच करने वाली प्रशिक्षित महिलाओं को निर्धारित मानदेय के आधार पर भुगतान किया जाता है। इससे ग्रामीण महिलाओं को अपने गांव में रहते हुए आय अर्जित करने का अवसर मिल रहा है। खास बात यह है कि इस काम के लिए उन्हें गांव छोड़कर बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। वे घरेलू जिम्मेदारियों के साथ पेयजल गुणवत्ता की निगरानी में भी योगदान दे रही हैं। इस तरह जल जीवन मिशन ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी और आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे रहा है।प्रदेश में महिलाओं के माध्यम से तैयार जल गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क के तहत बड़े पैमाने पर पानी के नमूनों की जांच हुई है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 में 39,47,102 और 2023-24 में 36,68,743 जल नमूनों का परीक्षण किया गया। वर्ष 2024-25 में 38,19,440 और 2025-26 में 5,51,221 नमूनों की जांच हुई। वहीं वित्तीय वर्ष 2026-27 में खबर लिखे जाने तक 23,34,754 जल नमूनों का परीक्षण किया जा चुका है। इस तरह पांच वित्तीय वर्षों में कुल 1,43,21,260 जल नमूनों की जांच दर्ज की गई है। यह आंकड़ा प्रदेश में गांव स्तर पर विकसित जल गुणवत्ता निगरानी तंत्र के व्यापक दायरे को दर्शाता है।सुजलाम शक्ति समूह से जुड़ी महिलाओं की भूमिका केवल पानी के नमूनों की जांच तक सीमित नहीं है। वे ग्रामीण परिवारों को सुरक्षित पेयजल के उपयोग, पानी की बर्बादी रोकने और वर्षा जल संरक्षण के प्रति भी जागरूक कर रही हैं। जल जीवन मिशन के तहत पिछले सात वर्षों में प्रदेश के गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर महिला समूहों का नेटवर्क विकसित किया गया है। इन समूहों की सक्रियता से जल गुणवत्ता की जांच को गांव स्तर तक पहुंचाने में मदद मिली है। खास बात यह है कि जिन ग्रामीण परिवारों तक नल से जल पहुंचाया जा रहा है, उसी गांव की प्रशिक्षित महिलाएं उसकी गुणवत्ता की निगरानी में भागीदार बन रही हैं। इससे पेयजल व्यवस्था में स्थानीय समुदाय की भूमिका भी मजबूत हो रही है। उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) के प्रबंध निदेशक योगेश कुमार ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर तक शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण पेयजल पहुंचाना विभाग की प्राथमिकता है। गांव स्तर पर प्रशिक्षित महिलाओं को जल गुणवत्ता की जांच से जोड़कर निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया गया है।






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