Lifestyle News: महात्मा गांधी से जुड़ा भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ आज भारतीय जनमानस में बेहद प्रसिद्ध है। गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में नियमित रूप से गाए जान…
Lifestyle News: महात्मा गांधी से जुड़ा भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ आज भारतीय जनमानस में बेहद प्रसिद्ध है। गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में नियमित रूप से गाए जाने वाले इस भजन का इतिहास उनकी जिंदगी से कई सदियों पहले तक जाता है। 15वीं शताब्दी में गुजराती संत-कवि नरसिंह मेहता द्वारा रचित यह भजन बाद में गांधीजी के विचारों और सार्वजनिक जीवन से गहराई से जुड़ गया।
‘वैष्णव जन तो’ की रचना गुजरात के संत-कवि नरसिंह मेहता ने की थी। यह भजन सौराष्ट्र की लोक परंपरा से जुड़ा रहा और शुरुआती दौर में इसे लोक शैली में गाया जाता था। उस समय इसके साथ एकतारा और मंजीरे जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया जाता था।
भजन का मूल संदेश दूसरों के दुख को समझने, जरूरतमंद की मदद करने और मदद करते समय अहंकार से दूर रहने जैसे मानवीय मूल्यों पर केंद्रित है।
महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ने से करीब पांच शताब्दी पहले से यह भजन गुजरात की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का हिस्सा था। गांधीजी की मां पुतलीबाई वैष्णव परंपरा से जुड़ी थीं, इसलिए माना जाता है कि गांधीजी ने बचपन में भी ऐसे भजनों को सुना होगा।
बाद में गांधीजी ने इस भजन को अपनी प्रार्थना सभाओं का हिस्सा बनाया और इसके संदेश को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाया।
गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास से भी इस भजन का संबंध सामने आता है। ऐतिहासिक शोध के अनुसार, 1907 के आसपास गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स सेटलमेंट और टॉल्स्टॉय फार्म से जुड़े लोगों के बीच इस भजन को गाया और साझा किया था।
यही वजह है कि इस भजन की यात्रा भारत की सीमाओं से बाहर भी गांधीजी के सार्वजनिक जीवन के साथ जुड़ती दिखाई देती है।
भारत लौटने के बाद गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में ‘वैष्णव जन तो’ का महत्व बढ़ता गया। 1930 के दांडी मार्च के दौरान भी यह भजन गाया गया था। इसके बाद यह स्वतंत्रता आंदोलन और गांधीजी की सार्वजनिक छवि से और अधिक मजबूती से जुड़ गया।
गांधीजी के लिए संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था। वह इसे सामूहिकता, आत्मिक विकास और सामाजिक संदेश से जोड़कर देखते थे।
समय के साथ ‘वैष्णव जन तो’ भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंचा। गांधीजी की 150वीं जयंती के अवसर पर दुनिया के अलग-अलग देशों के कलाकारों ने इस भजन को अपनी आवाज दी। इससे यह रचना वैश्विक सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी बनी।
आज भी यह भजन गांधीजी की विरासत, गुजरात की लोक-संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण रचना के रूप में याद किया जाता है।






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