सीमावर्ती इलाकों तक पहुंची सरकार, विकास को मिली नई गति

अक्टूबर 2026: उत्तराखंड सरकार ने राज्य के दूरस्थ और सीमावर्ती क्षेत्रों तक शासन का विस्तार करने के लिए एक नई पहल की है। इस पहल के तहत भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास स्थित चंपावत जिले के बनबसा में एनएचपीसी परिसर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल की बैठक हुई. चंपावत जिले में आयोजित यह पहली कैबिनेट बैठक थी। बैठक में दर्जनों महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि कैबिनेट की बैठकें अब देहरादून तक ही सीमित नहीं रहेंगी बल्कि राज्य के विभिन्न जिलों में भी होंगी। इससे स्थानीय स्तर की समस्याओं, विकास की संभावनाओं और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को सीधे सरकार के सामने रखने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास प्रशासन और लोगों के बीच की दूरी को कम करना और यह सुनिश्चित करना है कि विकास योजनाओं का लाभ राज्य के अंतिम छोर तक पहुंचे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्र केवल राज्य की भौगोलिक सीमा नहीं हैं, बल्कि देश की सुरक्षा, संस्कृति और विकास की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ना राज्य सरकार की प्राथमिकता है। इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, रोजगार, पर्यटन और कनेक्टिविटी को और मजबूत किया जा रहा है

उन्होंने कहा कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में कैबिनेट बैठकें आयोजित करने से सरकार को स्थानीय परिस्थितियों, जनता की अपेक्षाओं और विकास आवश्यकताओं को और अधिक बारीकी से समझने में मदद मिलेगी। इससे विशिष्ट क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों पर प्रभावी और त्वरित निर्णय का मार्ग भी प्रशस्त होगा

देवभूमि की लोक परंपरा की अनमोल विरासत 'फर्रा/छंतोली' प्रस्तुत

बनबसा में आयोजित कैबिनेट बैठक के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और मंत्रिमंडल के सदस्यों को देवभूमि की समृद्ध लोक परंपराओं की अनमोल विरासत, जिसे 'फर्रा/छंतोली' के नाम से जाना जाता है, भेंट की गई। यह चंपावत के देवीधुरा की प्रसिद्ध बग्वाल परंपरा से जुड़ी एक पारंपरिक ढाल है

बग्वाल परंपरा में उपयोग की जाने वाली पारंपरिक ढाल मुख्य रूप से बांस या रिंगाल की पट्टियों से बनाई जाती है और इसे छतरी के आकार में बनाया जाता है। मुख्यमंत्री एवं कैबिनेट मंत्रियों को इस पारंपरिक विरासत की प्रस्तुति देवभूमि की लोक संस्कृति, परंपराओं और सीमांत क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के प्रति सम्मान का प्रतीक है।