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जाति नहीं, अपराध देखकर चलेगा कानून! योगी आदित्यनाथ का साफ संदेश -

🕐 25 Oct 2026, 10:40 am• 3 min padho • Chugal Khor News
जाति नहीं, अपराध देखकर चलेगा कानून! योगी आदित्यनाथ का साफ संदेश -

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाहुबली नेताओं, जातीय समीकरणों और कानून-व्यवस्था को लेकर बहस एक बार फिर चर्चा में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले भी माफिया के खिलाफ कार्रवाई को जाति और धर्म से ऊपर बताते रहे हैं। मुख्तार अंसारी के आपराधिक मामलों और योगी सरकार की नीति के बीच राजनीतिक बयानबाजी ने इस मुद्दे को और अहम बना दिया है।

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उत्तर प्रदेश की सियासत में अपराध और जातीय समीकरण लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई मौकों पर कहा है कि माफिया के खिलाफ कार्रवाई का आधार उसकी जाति, धर्म या समुदाय नहीं, बल्कि उसके आपराधिक कृत्य होने चाहिए। एक साक्षात्कार में योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि माफिया को जाति, समुदाय या धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। उन्होंने अपराधियों को समाज का दुश्मन बताते हुए अपनी सरकार की सख्त कार्रवाई की नीति का हवाला दिया था।

पूर्वांचल की राजनीति में मुख्तार अंसारी का नाम लंबे समय तक प्रभावशाली रहा। उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे और विभिन्न मामलों में उन्हें अदालतों से सजा भी मिली। मार्च 2024 में उनकी मृत्यु के बाद भी उनके आपराधिक इतिहास, राजनीतिक प्रभाव और उत्तर प्रदेश में माफिया के खिलाफ कार्रवाई को लेकर बहस जारी रही। मुख्तार अंसारी के खिलाफ पहला मामला 1978 में दर्ज हुआ था, जबकि उनकी पहली सजा 2022 में हुई थी। उनके खिलाफ दर्ज मामलों और न्यायिक कार्रवाई का इतिहास प्रदेश में संगठित अपराध की समस्या को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी भी राजनीति में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में अंसारी परिवार और प्रदेश की कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दे राजनीतिक चर्चाओं में समय-समय पर सामने आते रहते हैं।

उत्तर प्रदेश में राजपूत या ठाकुर समाज, क्षेत्रीय प्रभाव और बाहुबली नेताओं की राजनीति को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। राजा भैया, धनंजय सिंह, बृजभूषण शरण सिंह और बृजेश सिंह जैसे नाम अलग-अलग राजनीतिक और क्षेत्रीय संदर्भों में चर्चा में आते रहे हैं। हालांकि, किसी नेता की जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर उसे अपराध से जोड़ना उचित नहीं है। इसी तरह, किसी सरकार पर चुनिंदा लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने या किसी वर्ग के लोगों को संरक्षण देने का आरोप हो, तो उसका आकलन संबंधित मामलों, सरकारी कार्रवाई और न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना चाहिए।योगी सरकार के समर्थक उसकी माफिया विरोधी नीति को कानून-व्यवस्था में सुधार की दिशा में उठाया गया कदम बताते हैं। वहीं, सरकार के आलोचक कार्रवाई की निष्पक्षता और उसके कानूनी आधार पर सवाल उठाते रहे हैं। इन दोनों पक्षों के दावों की पड़ताल के लिए ठोस तथ्यों और मामलों का विश्लेषण जरूरी है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार अपराध और माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी प्रमुख नीतियों में गिनाती है। अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई, संपत्तियों की कुर्की और आपराधिक मामलों में अभियोजन इस नीति के प्रमुख हिस्से रहे हैं। हालांकि, किसी भी कार्रवाई की वैधता का निर्धारण कानून और न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए। कानून का राज तभी मजबूत होता है, जब अपराध के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों को अदालत में सजा मिले और नागरिकों के कानूनी अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित हो।

उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण और कानून-व्यवस्था दोनों ही राजनीतिक विमर्श के महत्वपूर्ण विषय हैं। एक ओर सरकार माफिया के खिलाफ सख्त रुख को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करती है, तो दूसरी ओर विपक्ष उसकी कार्रवाई के तरीके और निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। ऐसे में असली सवाल यह है कि अपराध के खिलाफ कार्रवाई कितनी प्रभावी, निष्पक्ष और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप है। जातीय आरोपों और राजनीतिक बयानबाजी से अलग हटकर सरकारी आंकड़ों, अदालतों के फैसलों और दर्ज मामलों के आधार पर ही इस बहस का तथ्यपरक आकलन किया जा सकता है।

स्रोत: Filmitics

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