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3 उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा सीट एक बार फिर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी चर्चा के केंद्र में है। मऊ जिले की इस सीट का पिछले कुछ चुनावों का इतिहास बताता है कि यहां राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते रहे हैं। कभी बीजेपी के फागू चौहान ने जीत दर्ज की, फिर 2022 में दारा सिंह चौहान सपा के टिकट पर विधायक बने और उनके बीजेपी में लौटने के बाद हुए 2023 के उपचुनाव में सपा के सुधाकर सिंह ने बड़ी जीत दर्ज की। अब सुधाकर सिंह के निधन के बाद सीट पर एक और उपचुनाव की स्थिति बनी और 2027 की लड़ाई के लिए नए समीकरणों की जमीन तैयार हो रही है।
घोसी विधानसभा सीट पर 2017 के चुनाव में बीजेपी के फागू चौहान ने बीएसपी के अब्बास अंसारी को हराकर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में मुकाबले की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार दारा सिंह चौहान ने 1,08,430 वोट हासिल करते हुए बीजेपी के विजय कुमार राजभर को 22,216 वोटों से हराया। विजय कुमार राजभर को 86,214 वोट मिले थे।लेकिन दारा सिंह चौहान का सपा के साथ यह सफर ज्यादा लंबा नहीं चला। उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दिया और बीजेपी में वापसी कर ली। इसके बाद 2023 में घोसी विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ।
2023 का घोसी उपचुनाव इस सीट की सियासत में अहम मोड़ साबित हुआ। बीजेपी ने दारा सिंह चौहान को ही मैदान में उतारा, जबकि सपा ने सुधाकर सिंह को उम्मीदवार बनाया। नतीजे में सुधाकर सिंह को 1,24,427 वोट मिले, जबकि दारा सिंह चौहान को 81,668 वोट हासिल हुए। सुधाकर सिंह ने 42,759 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।यानी 2022 में सपा के टिकट पर जीतने वाले दारा सिंह चौहान जब बीजेपी के टिकट पर मैदान में लौटे, तो उन्हें सपा के सुधाकर सिंह से बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इस नतीजे ने घोसी में पार्टी, उम्मीदवार और स्थानीय राजनीतिक पकड़ के महत्व को फिर चर्चा में ला दिया।
सुधाकर सिंह के निधन के बाद घोसी विधानसभा सीट एक बार फिर खाली हुई। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यहां उपचुनाव की स्थिति बनी है। सपा ने दिवंगत विधायक सुधाकर सिंह के बेटे सुजीत सिंह को उपचुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित किया है। इस घटनाक्रम ने 2027 की सियासी तैयारी को भी नया आयाम दे दिया है। बीजेपी और सपा के बीच मुकाबले के साथ-साथ दूसरे दलों की भूमिका भी अहम हो सकती है।
घोसी की राजनीति में मुस्लिम, दलित, राजभर, यादव और चौहान समेत विभिन्न सामाजिक समूहों की चुनावी भूमिका पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। हालांकि किसी भी चुनाव में इन समूहों का मतदान एकतरफा रहने की गारंटी नहीं मानी जा सकती। उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, पार्टी संगठन, गठबंधन, क्षेत्रीय मुद्दे और मतदान प्रतिशत जैसे कारक भी नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं।2022 में बीएसपी उम्मीदवार को भी 54,248 वोट मिले थे, जो करीब 21 प्रतिशत वोट शेयर था। ऐसे में दलित और अन्य गैर-बीजेपी/गैर-सपा वोटों का बंटवारा भी घोसी के चुनावी समीकरण में महत्वपूर्ण हो सकता है।
2027 की लड़ाई में घोसी के लिए स्थानीय विकास, रोजगार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान और महंगाई जैसे मुद्दों के साथ सामाजिक समीकरण भी चर्चा में रह सकते हैं। वहीं दलों के संभावित गठबंधन और उम्मीदवारों का चयन मुकाबले की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण कारक होंगे।घोसी की सियासत का इतिहास फिलहाल यही बताता है कि यहां पार्टी बदलने से लेकर उपचुनाव तक, हर घटनाक्रम ने चुनावी तस्वीर बदली है। अब 2027 में कौन सा राजनीतिक समीकरण आकार लेता है और घोसी की जनता किस मुद्दे और उम्मीदवार को प्राथमिकता देती है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
रश्मि सिंह एक अनुभवी पत्रकार और डिजिटल कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता, न्यूज़ रिपोर्टिंग और डिजिटल मीडिया का व्यापक अनुभव है। उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है और अपने पत्रकारिता करियर में कई बड़े मीडिया संस्थानों और न्यूज़ चैनलों के साथ काम किया है।राजनीति, जनसरोकार, उत्तर प्रदेश की सियासत और समसामयिक मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ है। खबरों को सरल, तथ्यपरक और पाठकों के लिए रोचक अंदाज में प्रस्तुत करना उनकी लेखन शैली की खासियत है। डिजिटल पत्रकारिता के बदलते दौर में रश्मि सिंह का प्रयास है कि पाठकों तक तेज, विश्वसनीय और आसान भाषा में तथ्य आधारित खबरें पहुंचें।
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