गोरखपुर टेराकोटा को ODOP से मिली नई पहचान, अमेरिका-इंग्लैंड तक पहुंची मिट्टी की कलाकारी

गोरखपुर। मिट्टी से खूबसूरत कलाकृतियां तैयार करने की सदियों पुरानी परंपरा अब गोरखपुर के लिए रोजगार और वैश्विक पहचान का बड़ा माध्यम बन रही है। कभी दीये, मटके और हांडी बनाने तक सीमित रहने वाला यहां का टेराकोटा उद्योग आज आधुनिक डिजाइन के हाथी, घोड़े, लैंप, झूमर, सजावटी जालियां और डिजाइनर गमलों के जरिए देश-विदेश में अपनी पहचान बना रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षी एक जिला एक उत्पाद (ODOP) योजना ने इस पारंपरिक शिल्प को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई है। सरकारी सहयोग, जीआई टैग और कारीगरों के नए प्रयोगों ने गोरखपुर की मिट्टी की कला को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा दिया है
गोरखपुर के टेराकोटा उद्योग को आगे बढ़ाने में ODOP योजना महत्वपूर्ण साबित हो रही है। इस योजना के माध्यम से कारीगरों को प्रशिक्षण, ऋण, अनुदान, आधुनिक उपकरण और उत्पादों की मार्केटिंग से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे पारंपरिक रूप से इस काम में लगे परिवारों को अपने कारोबार का विस्तार करने का अवसर मिल रहा है। संयुक्त आयुक्त उद्योग उज्ज्वल सिंह के अनुसार, विभाग की ओर से टेराकोटा शिल्पकारों को विभिन्न योजनाओं का लाभ दिलाने के साथ उनके कौशल विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है। मार्केट डेवलपमेंट असिस्टेंट के माध्यम से कारीगरों को अलग-अलग प्रदर्शनियों में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे उनके उत्पादों को नए खरीदार और बाजार मिल सकें। इस पहल का एक सकारात्मक परिणाम यह भी है कि अब युवा पीढ़ी पारंपरिक मिट्टी के कारोबार को अपनाने में रुचि दिखा रही है
किसी पारंपरिक उत्पाद की असली पहचान उसकी गुणवत्ता और क्षेत्रीय विशेषता से होती है। गोरखपुर के टेराकोटा को जीआई (Geographical Indication) टैग मिलने से इसकी विशिष्ट पहचान को नई मजबूती मिली है। जीआई टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति और उससे जुड़ी विशेषताओं को प्रमाणित करता है। इससे ग्राहकों के बीच उत्पाद की प्रामाणिकता को लेकर भरोसा बढ़ता है। अब गोरखपुर में तैयार होने वाली मिट्टी की कलाकृतियां केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक भी पहुंच रही हैं। टेराकोटा शिल्पकार राजन प्रजापति के मुताबिक, उनके यहां तैयार उत्पाद अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और रूस जैसे देशों तक भेजे जा चुके हैं। विदेशी बाजारों में भी गोरखपुर की मिट्टी से बने सजावटी उत्पादों को पसंद किया जा रहा है
समय के साथ गोरखपुर के टेराकोटा उद्योग में डिजाइन और उत्पादों की विविधता बढ़ी है। पहले जहां कारीगर मुख्य रूप से दीये, मटके और हांडी तैयार करते थे, वहीं अब आधुनिक घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर आकर्षक कलाकृतियां बनाई जा रही हैं। हाथी, घोड़े, डिजाइनर लैंप, झूमर, सजावटी जालियां, बड़े गमले और आधुनिक डिजाइन वाले दीये इस उद्योग की नई पहचान बन रहे हैं। पारंपरिक मिट्टी के शिल्प में आधुनिक डिजाइन का समावेश होने से उत्पादों की उपयोगिता और बाजार दोनों का विस्तार हुआ है। शिल्पकार राजन प्रजापति बताते हैं कि उनके परिवार में मिट्टी से कलाकृतियां बनाने का काम कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। उन्होंने बचपन से ही अपने बाबा-दादा और पिता को दीये, मटके तथा हांडी बनाते देखा। बाद में उन्होंने इस पारंपरिक हुनर के साथ अपनी शिक्षा और डिजाइन की समझ को जोड़ा। इसी सोच ने उन्हें पुराने उत्पादों से आगे बढ़कर नए और आकर्षक डिजाइन तैयार करने के लिए प्रेरित किया
गोरखपुर की टेराकोटा कला को नई पहचान दिलाने वाले शिल्पकार राजन प्रजापति को वर्ष 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। यह सम्मान उनके व्यक्तिगत कौशल के साथ गोरखपुर की समृद्ध पारंपरिक शिल्पकला की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान को भी दर्शाता है। राजन ने पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए मिट्टी की कलाकृतियों में नए प्रयोग किए और आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करने पर जोर दिया। उनका मानना है कि परंपरा को बनाए रखते हुए नए डिजाइन और तकनीक अपनाना जरूरी है। इससे न केवल कारोबार का विस्तार होता है, बल्कि नई पीढ़ी को भी इस कला से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है
त्योहारों के दौरान गोरखपुर के टेराकोटा कारीगरों के लिए कारोबार का महत्वपूर्ण समय होता है। खासकर दीपावली पर मिट्टी के दीये, सजावटी लैंप और घरों को सुंदर बनाने वाली कलाकृतियों की मांग बढ़ जाती है। अब ग्राहक पारंपरिक दीयों के साथ आकर्षक डिजाइन वाले सजावटी उत्पादों को भी पसंद कर रहे हैं। पर्यावरण के अनुकूल और बायोडिग्रेडेबल होने के कारण मिट्टी से बने उत्पादों के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है। त्योहारों के समय मांग पूरी करने के लिए कारीगरों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। वहीं, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल माध्यमों ने भी इन उत्पादों को नए ग्राहकों तक पहुंचाने के रास्ते खोले हैं
गोरखपुर के टेराकोटा उद्योग ने भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बनाई है, लेकिन इसके विस्तार के लिए कुछ बुनियादी सुविधाओं की जरूरत अभी भी बनी हुई है। कारीगरों के सामने आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता, बेहतर भट्टियां, कच्चे माल की आपूर्ति, पर्याप्त पूंजी और तैयार उत्पादों की सुरक्षित ढुलाई जैसी चुनौतियां हैं। मिट्टी के उत्पादों को पकाने और बड़े बाजारों तक पहुंचाने के लिए आधुनिक तकनीक और बेहतर परिवहन व्यवस्था महत्वपूर्ण है। हालांकि, शिल्पकार राजन प्रजापति का कहना है कि महंगाई, मजदूरी और कच्चे माल की लागत बढ़ने के साथ उत्पादों की बिक्री और आमदनी में भी वृद्धि हुई है। उनके अनुसार, फिलहाल वे अपने कारोबार की स्थिति से संतुष्ट हैं
टेराकोटा उद्योग को और मजबूत बनाने के लिए उद्योग विभाग साझा सुविधा केंद्र यानी कॉमन फैसिलिटी सेंटर (CFC) स्थापित करने की दिशा में प्रयास कर रहा है। संयुक्त आयुक्त उद्योग उज्ज्वल सिंह के मुताबिक, इस केंद्र का प्रस्ताव प्रक्रिया में है। इसके माध्यम से कारीगरों को आधुनिक तकनीक, बेहतर उपकरण और उत्पादन से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है। इसके अलावा ODOP प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है। आईआईटी कानपुर की टीम की ओर से कारीगरों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। विभाग का उद्देश्य है कि पारंपरिक शिल्पकार नई तकनीक, आधुनिक डिजाइन और बाजार की बदलती मांग के अनुरूप अपने उत्पाद तैयार कर सकें
गोरखपुर का टेराकोटा उद्योग इस बात का उदाहरण है कि पारंपरिक हुनर को सही सरकारी सहयोग, आधुनिक तकनीक और बेहतर बाजार उपलब्ध कराया जाए तो उसे बड़े उद्यम में बदला जा सकता है। ODOP योजना से मिली सहायता, जीआई टैग से बनी पहचान और शिल्पकारों के नए प्रयोगों ने इस कला को स्थानीय सीमाओं से बाहर निकालकर वैश्विक मंच तक पहुंचाया है। आज मिट्टी को आकार देने वाले कारीगर केवल कलाकृतियां नहीं बना रहे, बल्कि अपने परिवारों के लिए रोजगार, युवाओं के लिए स्वरोजगार और गोरखपुर के लिए नई पहचान भी तैयार कर रहे हैं। जरूरत इस विरासत को आधुनिक सुविधाओं, बेहतर विपणन और नई पीढ़ी की भागीदारी के साथ लगातार आगे बढ़ाने की है, ताकि गोरखपुर का टेराकोटा आने वाले समय में भी दुनिया भर में अपनी चमक बिखेरता रहे
स्रोत: RNI News
