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1 क्या ब्राह्मणों के समर्थन में बोलना नरोत्तम मिश्रा को भारी पड़ गया है? क्या ब्राह्मणों के पक्ष में खुलकर हुंकार भरने के बाद बीजेपी ने अपने ही दिग्गज नेता को साइडलाइन करना शुरू कर दिया है? क्योंकि पहले टिकट कटा… और अब ग्वालियर में हुई बीजेपी की कोर कमेटी की बैठक से भी नरोत्तम मिश्रा की गैरमौजूदगी ने सियासी सवाल खड़े कर दिए हैं! जी हां, मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों नरोत्तम मिश्रा को लेकर चर्चाएं तेज हैं।

बताया जा रहा है कि ग्वालियर में हुई बीजेपी की कोर कमेटी की बैठक में नरोत्तम मिश्रा शामिल नहीं हुए। पार्टी की बैठकों में उनकी मौजूदगी को लेकर चर्चाएं होती रही हैं, इसलिए इस बार उनकी गैरमौजूदगी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। और इन सवालों को हवा उस वक्त मिली, जब हाल ही में नरोत्तम मिश्रा ब्राह्मण सम्मेलन में पहुंचे और उन्होंने मंच से ब्राह्मण समाज के मुद्दों पर खुलकर बात की। नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि ब्राह्मणों की खामोशी को कमजोरी न समझा जाए। उन्होंने तर्क दिया कि ब्राह्मण ने कभी किसी का शोषण नहीं किया और कहा कि चारों युगों में ब्राह्मण न जातिवादी रहा और न शोषण करने वाला। उन्होंने यह भी कहा कि आज ब्राह्मणों को अपमानित किया जा रहा है और उन पर टिप्पणियां की जा रही हैं। नरोत्तम मिश्रा के इस बयान के बाद ब्राह्मण समाज के बीच उनका समर्थन भी देखने को मिला। सम्मेलन में बड़ी संख्या में लोग और कई गाड़ियां नजर आईं। लेकिन अब सवाल ये है कि क्या इस मुखर रुख की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ रही है? क्योंकि पहले नरोत्तम मिश्रा को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिला और अब कोर कमेटी की बैठक से उनकी गैरमौजूदगी ने चर्चाओं को और तेज कर दिया है। हालांकि बीजेपी की तरफ से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उनकी गैरमौजूदगी की वजह ब्राह्मण मुद्दे पर उनके बयान हैं। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल उत्तर प्रदेश की राजनीति को लेकर भी खड़ा हो रहा है। क्या बीजेपी के भीतर सामान्य वर्ग के नेता ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं? क्या उन्हें भी यह आशंका है कि पार्टी लाइन से अलग जाकर बोलने पर राजनीतिक नुकसान हो सकता है? याद कीजिए, उत्तर प्रदेश में जब कुछ ब्राह्मण विधायकों की बैठक की खबर सामने आई थी, तब बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की तरफ से कहा गया था कि इस तरह की जातीय बैठकें स्वीकार नहीं की जाएंगी और कार्रवाई की बात कही गई थी। वहीं दूसरी तरफ संजय निषाद, ओम प्रकाश राजभर और दूसरे सहयोगी दलों के नेता अपने-अपने सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बयान देते नजर आते हैं। तो क्या बीजेपी के भीतर सामान्य वर्ग के नेताओं की चुप्पी के पीछे यही राजनीतिक गणित है? क्या नरोत्तम मिश्रा का मामला दूसरे नेताओं के लिए एक संदेश बन गया है? फिलहाल इन सवालों के जवाब साफ नहीं हैं। लेकिन नरोट्टम मिश्रा की कोर कमेटी बैठक से गैरमौजूदगी ने मध्य प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तक एक नई राजनीतिक बहस जरूर छेड़ दी है। अब देखना होगा कि नरोत्तम मिश्रा और बीजेपी के बीच आगे क्या सियासी तस्वीर सामने आती है

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