Uttarakhand News: उत्तराखंड के किसानों के लिए जड़ी-बूटी की खेती आय का नया विकल्प बनने जा रही है. राज्य में पहली बार बड़े स्तर पर निजी कृषि भूमि को औषधीय और सगं…
Uttarakhand News: उत्तराखंड के किसानों के लिए जड़ी-बूटी की खेती आय का नया विकल्प बनने जा रही है. राज्य में पहली बार बड़े स्तर पर निजी कृषि भूमि को औषधीय और सगंध पौधों की खेती से जोड़ने की पहल की गई है. इसके तहत किसान अपनी खाली और परती पड़ी जमीन पर जंगली जड़ी-बूटियों की खेती कर सकेंगे. योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा करने के साथ किसानों को पारंपरिक खेती के अतिरिक्त कमाई का विकल्प उपलब्ध कराना है
जड़ी-बूटियों की खेती के लिए राज्य के 11 जिलों में आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. इच्छुक किसान 25 अक्टूबर तक अपने नजदीकी वन विभाग कार्यालय में आवेदन कर सकते हैं. हर जिले में इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए नोडल अधिकारी भी नियुक्त किए गए हैं. हरिद्वार और ऊधमसिंहनगर को छोड़कर अन्य 11 जिलों में यह प्रक्रिया शुरू की गई है
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए जड़ी-बूटी की खेती को किसानों के लिए उपयोगी विकल्प माना जा रहा है. पहाड़ी क्षेत्रों में खेती की जमीन अक्सर छोटी-छोटी जोत में बंटी होती है. इसके अलावा कई जगह खेती की जमीन खाली या परती पड़ी रहती है. ऐसे में औषधीय और सगंध पौधों की खेती के जरिए इन जमीनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है
इस पहल से किसानों को अपनी कृषि भूमि से अतिरिक्त आय हासिल करने का अवसर मिल सकता है. साथ ही, स्थानीय स्तर पर जड़ी-बूटी आधारित गतिविधियों को बढ़ावा मिलने से गांवों में रोजगार के नए अवसर भी तैयार हो सकते हैं
योजना में छोटे किसानों को भी ध्यान में रखा गया है. व्यक्तिगत रूप से जड़ी-बूटी की खेती करने के लिए किसान के पास कम से कम दो हेक्टेयर जमीन होना जरूरी है. वहीं, जिन किसानों के पास इतनी जमीन नहीं है, वे समूह बनाकर सामूहिक खेती के लिए आवेदन कर सकते हैं. सामूहिक खेती के लिए अधिकतम 30 हेक्टेयर भूमि का प्रावधान रखा गया है. इसके अलावा स्वयं सहायता समूह, फर्म, पंजीकृत कंपनियां और सहकारी समितियां भी इस योजना में शामिल हो सकती हैं. इससे अलग-अलग वर्गों को जड़ी-बूटी उत्पादन से जुड़ने का अवसर मिलेगा
सरकार ने राज्य की करीब पांच हजार वन पंचायतों को भी इस पहल से जोड़ने का लक्ष्य रखा है. इससे योजना का दायरा केवल व्यक्तिगत किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण समुदायों को भी इससे जोड़ा जा सकेगा. उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों की उपलब्धता और पारंपरिक ज्ञान पहले से मौजूद है. ऐसे में खेती के जरिए औषधीय पौधों के उत्पादन को बढ़ावा देने से स्थानीय स्तर पर एक पूरी मूल्य श्रृंखला विकसित होने की संभावना है. इससे किसानों के साथ-साथ ग्रामीण युवाओं और स्थानीय उद्यमियों के लिए भी काम के अवसर बन सकते हैं
पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों के सामने बंदर, जंगली सूअर और अन्य वन्यजीवों से फसलों को नुकसान की समस्या भी रहती है. इसकी वजह से कई किसान पारंपरिक खेती से दूरी बनाने लगे हैं. ऐसे में औषधीय और सगंध पौधों की खेती को वैकल्पिक कृषि गतिविधि के तौर पर बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है. अगर किसान इस खेती को अपनाते हैं तो परती जमीन का उपयोग बढ़ सकता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है. गांव में रोजगार और आय के अवसर बढ़ने से स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां भी तेज होने की उम्मीद है





टिप्पणियाँ 0